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रविवार, अगस्त 02, 2009

तेरे जैसा यार कहां?

आज फ्रेंडशिप डे है। अमूनन हम ऐसे किसी डे में विश्वास नहीं रखते हैं। पर लोग कहते हैं कि जमाने के साथ चलना चाहिए। अगर जमाने की बात करें तो आज जमाना इतना बदल गया है कि अब न तो सच्ची दोस्ती आसानी से मिल पाती है, न ही सच्चे दोस्त मिल पाते हैं। स्वार्थ के इस जमाने में दोस्ती भी स्वार्थ परक हो गई है। ऐसे में हमें अपने बचपन की दोस्ती याद आती है जिस दोस्ती की एक समय हमारे गृहनगर भाटापारा में मिसाल दी जाती थी। हमारी दोस्त एक मुस्लिम युवक शौकत अली साजन से थी। यह दोस्ती आज भी कायम है, पर अंतर यह है कि हम लोग बरसों से जुदा हो गए हैं और हमारे वे मित्र बेंगलोर में रहने लगे हैं। इसी के साथ काम की अधिकता हम दोनों के पास इतनी है कि अब समय ही नहीं मिल पाता है, बात करने के लिए। हमारे उन मित्र का परिवार रायपुर में है। लेकिन अब वहां पर भी आना-जाना कम हो गया है। एक समय वह था जब हम लोग हर दिन एक-दूसरे के घर में खाना खाते थे। अब तो यही सोचते हैं कि जाने कहां गए वो दिन।

इस दुनिया में वास्तव में वे इंसान बहुत किस्मत वाले होते हैं जिनको कोई सच्चा दोस्त मिल जाता है। हमारे जीवन में एक नहीं कई ऐसे दोस्त रहे हैं जिनकी दोस्ती पर हम गर्व कर सकते हैं। सबसे पहले सच्चे दोस्त की बात करें तो यह दोस्त हमारे बचपन के रहे हैं। जब हम लोग अपने गृहनगर भाटापारा में रहते थे, तब एक मुस्लिम युवक शौकत अली साजन से हमारी दोस्ती हुई। यह दोस्ती इस तरह से हुई कि हमारे बड़े भाई साहब और उनके पापा एक साथ काम करते थे। ऐसे में उनके घर आना-जाना हुआ तो एक शौकत ही नहीं बल्कि उनकी दो बहनों से भी हमारी बहुत अच्छी दोस्ती हो गई। कहीं भी बाहर जाना रहता तो हमारी चौकड़ी ही जाती। हमारी यह दोस्ती इस तरह से परवाह चढ़ी की हम लोग एक दिन भी एक दूसरे के बिना नहीं रह पाते थे। सुबह का खाना अगर शौकत हमारे घर में खाता तो शाम का खाना उनके घर में होता। शायद ही कोई ऐसा दिन होगा जब हम लोगों ने एक-दूसरे के घर में खाना न खाया हो।

इसी के साथ एक सबसे बड़ी बात यह थी कि हमारा रोज सुबह और शाम को घर के पास मातादेवालय मंदिर जाने का रूटीन था। हमारे सुबह के रूटीन में तो नहीं पर शाम के रूटीन में रोज शौकत भी साथ होते थे। हमारे साथ वे भी अपने माथे पर माता का टिका लगाते थे और हम लोग फिर देर रात तक घुमते रहते थे। अक्सर लोग उनको माथे पर टिका लगाने के कारण टोकते थे। हमारी जानकारी में मुस्लिम समाज में मूर्ति पूजा नहीं की जाती है। उनको अपने समाज में भी बहुत विरोध का सामना करना पड़ा था कि तुम रोज मंदिर क्यों जाते हो, लेकिन वह रोज हमारे साथ मंदिर जाते थे। वैसे हमने उन्हें कभी मंदिर जाने के लिए नहीं कहा। एक तरफ वो हमारे धर्म से जुड़े धार्मिक स्थल में जाते थे, दूसरे तरफ हमें भी उनके धार्मिक स्थल में जाने का मन होता था, पर हम जानते थे यह संभव नहीं है। ऐसे में हमने कभी उनके सामने जिद नहीं की। फिर भी हम उनके साथ कई बार कई दरगाहों में गए थे।

शौकत और हमारी दोस्ती की मिसाल पूरे शहर में दी जाती थी। कई मौकों पर कई लोग हमें भाई समझते थे। अरे भाई क्या हमारे वे मित्र भाई से कुछ ज्यादा ही थे। उनके परिवार में ऐसा कोई नाते रिश्तेदार नहीं होगा जिनके घर वे अकेले गए होंगे, और हमारे परिवार में भी ऐसा कोई रिश्तदार नहीं था जिनके घर हम शौकत के बिना गए होंगे। अगर किसी कारणवश कोई अकेला चला जाता तो सबको आश्चर्य होता था। हमारी भांजियों ने तो हम पति-पत्नी की संज्ञा तक दे रखी थी। कभी हम अकेले जाते तो वे पूछती थी कि शौकत मामी क्यों नहीं आई।

लंबे समय की दोस्ती को उस समय एक झटका लगा था जब उनका परिवार रायपुर चला आया। वैसे हमारे लिए रायपुर कोई दूर नहीं था और हम रायपुर में ही पढ़ते थे। लेकिन अब इतना मिलना नहीं हो पाता था। लेकिन हमारी दोस्ती की कशिश और किस्मत से हमें भी रायपुर के एक अखबार में काम मिल गया और हम भी यहां आ गए। लेकिन भाटापारा जैसे पुराने दिन हमारी जिंदगी में लौट के नहीं आ सके। हमने उनके घर के पास में घर भी लिया। पर काम की अधिकता ने फिर कभी इतना समय ही नहीं दिया कि हम लोग लंबे समय तक मिल बैठकर बातें कर पाते। और फिर हुआ यह कि उनकी शादी के कुछ सालों बाद उनको काम के सिलसिले में बेंगलोर जाना पड़ा और आज करीब 10 साल से हमारे वे मित्र बेंगलोर में है, अब तो फोन पर भी कभी- कभार बातें हो पाती हैं। रायपुर तो उनका आना कभी हो भी जाता है, पर हम ही कभी चाहकर बेंगलोर नहीं जा सके।

बहरहाल हमारे उन मित्र के घर से हमें अपने घर जितना ही प्यार मिला है। आज भी उनका परिवार यहां है। उनके मम्मी-पापा तो अब इस दुनिया में नहीं हंै। पर उन्होंने जीते जी हमें अपने बेटे से कम नहीं माना। हमें याद है जब उनकी मम्मी का इंतकाल हुआ था तो कब्रिस्तान में सिर्फ हमारे लिए उनका चेहरा खोला गया था ताकि हम अंतिम दर्शन कर सकें। एक तरफ हमें अपने दोस्त की मां का अंतिम संस्कार नसीब हुआ दूसरी तरफ हमें अपनी मां के अंतिम संस्कार में शामिल होना नसीब नहीं हुआ था क्योंकि हम रिपोर्टिंग करने के लिए बाहर गए थे। हमारे दोस्त शौकत के दो छोटे भाईयों आसिफ अली और शाकिर अली से भी हमारी अच्छी दोस्ती रही है। इनके और हमारे कुछ और अजीज दोस्तों की बातें अब बाद में क्योंकि हमारी पहली दोस्ती का किस्सा ही बहुत लंबा हो गया है। वैसे बातें तो इतनी हैं कि लिखा जाए तो लिखते ही रहे। पर ज्यादा क्या लिखे। आज इतना ही। अब तो बस हमारे साथ अपने दोस्त की पुरानी यादें हैं। हम आज फेंडशिप डे पर बस एक ही दुआ करते हैं कि हर किसी को जरूर जिंदगी में एक सच्चा दोस्त मिले। वैसे आज के जमाने में ऐेसा मुश्किल है, पर इतना भी मुश्किल नहीं है। कहते हैं दिल में सच्ची चाहत और लगन हो तो जरूर भगवान मिल जाता है, फिर ये तो सच्चा दोस्त है। चलिए आप भी सच्चे दिल से मांगिए तो आपको भी मिल जाएगा एक सच्चा दोस्त।


सभी मित्रों को फ्रेंडशिप डे की बहुत-बहुत बधाई।
एक दुआ है किसी का भी दोस्त किसी से जुदा न हो भाई

24 टिप्पणियाँ:

harseeta रवि अग॰ 02, 09:36:00 am 2009  

एक मुस्लिम युवक का रोज मंदिर जाना सच में हिम्मत का काम है। यह इस बात का सबूत है कि दोस्ती किसी भी धर्म और मजहब से कहीं ऊपर होती है।

guru रवि अग॰ 02, 09:51:00 am 2009  

आपकी दोस्ती को सलाम करते हैं गुरु

dilip gedekar,  रवि अग॰ 02, 09:56:00 am 2009  

सच कहा है आपने आज के जमाने में सच्चे दोस्त मिलते कहां है। जिनको सच्चा दोस्त मिल जाए तो उसका जीवन ही सफल हो जाए।

chintu रवि अग॰ 02, 10:17:00 am 2009  

दोस्तों के साथ न रहने का गम तो होता है, मित्र पर किया जाए हमेशा समय एक जैसा नहीं होता है। इंसान को जीने के लिए पैसों की जरूरत होती है और पैसा कमाने बाहर भी जाना पड़ता है।

neha रवि अग॰ 02, 10:31:00 am 2009  

आपके दूसरे दोस्तों के किस्सों का भी इंतजार रहेगा।

vinita,  रवि अग॰ 02, 10:56:00 am 2009  

काबिले दाद है आपकी दोस्ती

अर्चना तिवारी रवि अग॰ 02, 11:10:00 am 2009  

चाँद टूटे तारे टूटे पर ये दोस्ती कभी ना टूटे...

anu रवि अग॰ 02, 02:16:00 pm 2009  

दोस्ती का महान पर्व फेंडशिप डे मुबारक हो

pranav रवि अग॰ 02, 02:42:00 pm 2009  

आपने जैसी दोस्ती की दास्ता लिखी है, वैसी दोस्ती बहुत कम देखने को मिलती है। अपनी दोस्ती को ताउम्र संभाल कर रखे।

utam soni,  रवि अग॰ 02, 03:01:00 pm 2009  

हमारी भी फेंडशिप डे पर बधाई स्वीकार करें

ranju रवि अग॰ 02, 03:15:00 pm 2009  

दोस्त के लिए समय निकालकर आपको उनसे बात करते रहना चाहिए।

समयचक्र : महेन्द्र मिश्र रवि अग॰ 02, 03:46:00 pm 2009  

आपको मित्र दिवस की शुभकामना

bhavna,  रवि अग॰ 02, 06:47:00 pm 2009  

फेंडशिप डे मुबारक हो

kavita,  रवि अग॰ 02, 07:54:00 pm 2009  

सदा बनी रहे आपकी दोस्ती

vimla,  रवि अग॰ 02, 07:58:00 pm 2009  

कहते हैं दिल में सच्ची चाहत और लगन हो तो जरूर भगवान मिल जाता है, फिर ये तो सच्चा दोस्त है।
हम भी सहमत है

बवाल सोम अग॰ 03, 05:44:00 am 2009  

यौमे-अहबाब (मित्र-दिवस) पर आप और आपके शौकत भाईजान को मुबारक़बादियाँ।

बेनामी,  रवि फ़र॰ 14, 02:03:00 pm 2010  

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