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शनिवार, अगस्त 08, 2009

अनोखा कटहल

कटहल की सब्जी भले किसी को पसंद आती हो, पर हमें यह सब्जी बिलकुल पसंद नहीं आती है। हमारी श्रीमतीजी ने आज जब फरमाइश की कि आज तो कटहल की सब्जी ला दो। हम जब बाजार कटहल लेने जा रहे थे तो हमें बरसों पहले किसी कवि सम्मेलन में सुनी गई ये चंद लाईनें याद आ गईं जिसमें एक आंख वाले एक बंदे से सब्जी मंडी में अनोखा कटहल इजाद कर दिया था। देखिए इन लाईनों को और आप भी मिलीए अनोखे कटहल से

एक आंखे के अंधे ने

खुद के बंदे ने

सब्जी मंडी में प्रवेश किया

और मुंहासों से ओत-प्रोत

सब्जी वाली बाई के गालों पर

हाथ फेरते हुए पूछा

भाई साहब कटहल क्या रेट है

12 टिप्पणियाँ:

Udan Tashtari शनि अग॰ 08, 07:02:00 am 2009  

आशा करता हूँ ठीक ठाक होगे... :)

kn kishor,  शनि अग॰ 08, 08:59:00 am 2009  

कटहल की सब्जी तो मुझे भी पसंद नहीं, पर आपका कटहल अच्छा लगा।

kamal,  शनि अग॰ 08, 09:15:00 am 2009  

किसकी लिखी कविता है, जरा यह भी बता देते

राजकुमार ग्वालानी शनि अग॰ 08, 09:29:00 am 2009  

यह तो हमें भी याद नहीं है मित्र की यह कविता किसकी। हमने यह कविता काफी छोटे ते, तब एक कवि सम्मेलन में सुनी थी। बचपन से ही कवि सम्मेलनों में जाने और लिखना का शौक रहा है।

tina शनि अग॰ 08, 09:54:00 am 2009  

और मुंहासों से ओत-प्रोत
सब्जी वाली बाई के गालों पर
हाथ फेरते हुए पूछा
भाई साहब कटहल क्या रेट है
बहुत खूब गजब की कविता है।

guru शनि अग॰ 08, 10:23:00 am 2009  

वाह... क्या बात है गुरु

anu शनि अग॰ 08, 12:41:00 pm 2009  

मजेदार लाईनें सुनाई मजा आ गया

Dipti शनि अग॰ 08, 02:50:00 pm 2009  

बहुत मज़ेदार...

ranju शनि अग॰ 08, 04:57:00 pm 2009  

जोरदार कटहल है, सब्जा कब खिलाएंगे

m. akram,  रवि अग॰ 09, 12:30:00 am 2009  

कमाल का कटहल लाए हैं भाई

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