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रविवार, जुलाई 05, 2009

लग जाऊं तुम्हारे गले ऐसा इंतजाम करो ...


चांदनी रात का जरा दीदार करो

हसीन शमा है रात का जरा सा प्यार करो ।

हटाकर अपने चेहरे से काली जुल्फों को

इक नजर देखने का हसीन गुनाह करो ।

क्यों है छाया तुम्हारी नजरों में बेगानापन

मेरी मोहब्बत का जरा का इतबार करो ।


अपनी आंखों को दे कर थोड़ी सी जहमत

नजरों से मिलाकर नजरें बातें करो ।

तुम्हारी नजरों को चमन की बहारें चुमें

लग जाऊं तुम्हारे गले ऐसा इंतजाम करो ।


मेरे सपनों की शहजादी प्रियतमा

तुम हमारे प्यार का सपना साकार करो ।

7 टिप्पणियाँ:

rajni रवि जुल॰ 05, 11:06:00 pm 2009  

अच्छी कविता है, बधाई

raman,  रवि जुल॰ 05, 11:16:00 pm 2009  

हर युवा दिल की तमन्ना लगती है यह कविता

●๋• सैयद | Syed ●๋• रवि जुल॰ 05, 11:21:00 pm 2009  

जितनी सुन्दर रचना है, उतनी ही सुन्दर ऊपर लगी तस्वीर ... बहुत खूब !!

guru रवि जुल॰ 05, 11:22:00 pm 2009  

गजब लिखते हो गुरु

harseeta रवि जुल॰ 05, 11:32:00 pm 2009  

सुंदर अभिव्यक्ति है

vikas,  रवि जुल॰ 05, 11:43:00 pm 2009  

हटाकर अपने चेहरे से काली जुल्फों को
इक नजर देखने का हसीन गुनाह करो ।
क्यों है छाया तुम्हारी नजरों में बेगानापन
मेरी मोहब्बत का जरा का इतबार करो ।

बहुत मजेदार लिखा है मित्र, मजा आ गया, ऐसा लगता है कि हर युवा दिल अपनी प्रेयसी से यही कहता होगा

विवेक सिंह सोम जुल॰ 06, 10:22:00 pm 2009  

rajni जी की टिप्पणी को हमारी भी टिप्पणी समझा जाय !

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