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मंगलवार, जून 30, 2009

आस्था का सैलाब

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में संत आसाराम बापू के दो दिनों तक चले प्रवचन में आस्था का सैलाब देखने को मिला। बापू को सुनने के लिए हजारों की संख्या में उनके चाहने वाले पूरे राज्य के साथ दूसरे राज्यों के भी आए। मैदान में पैर रखने की भी जगह नहीं थी। बापू के सत्संग का लाभ लेने मुख्यमंत्री डॉ। रमन सिंह के साथ विधानसभा अध्यक्ष धरमलाल कौशिक, गृहमंत्री ननकीराम कंवर, संस्कृति मंत्री बृजमोहन अग्रवाल और कृषि मंत्री चंद्रशेखर साहू भी पहुंचे। उक्त जन प्रतिनिधियों ने बापू से आशीर्वाद लेने के बाद प्रदेश की सुख और समृद्धि के लिए काम करने का वचन भी दिया।



प्रवचन देते हुए बापू ने कहा कि सुख बाहर की चीज नहीं है, वर्तमान का अनादर कर भविष्य के सुख की लालसा करना संभव नहीं। आपका वर्तमान सच्चिदानंद परमात्मा का है। जो भूतकाल की बात करते हैं , वे ईश्वर का अनादर करते हैं । भविष्य में ये मिले, जहां-वहां जाऊंगा, यदि सोचते हैं तो यह भी परमात्मा का अनादर होता है। घर में आए महात्मा को छोड़कर बाहर से आए किसी अन्य का सम्मान करना भी अनादर है। भगवान के साथ संबंध रहेगा तो मनुष्य की जीवन धारा बदल जाएगी। शरीर मरता है आत्मा सनातन है। वर्तमान में कितना बड़ा भी दुख आ जाए उसे भगा सकते हैं यदि परमात्मा की स्मृति कर लें। ईश्वर के स्वभाव और चेतना का तिरस्कार करके वर्तमान का अनादर कर भविष्य के सुख की आशा करना फालतू मन की बदमाशी है। अभी का चेतन ज्ञान स्वरुप है, सनातन स्वरुप है, जो भूतकाल की बात करते हैं वे भी ईश्वर का अनादर करते हैं । सुख बाहर की चीज नहीं है जो अभागा जीवन सोच-सोच कर पक्षतावा करते हैं ऐसे लोग और उनकी सात पीढिय़ां दुख भोगती हैं। जो आपको अच्छा नहीं लगता वो दूसरो को कैसे अच्छा लगेगा, आप चाहते हैं कोई आपको न ठगे तो आप दूसरों को न ठगे ऐसे में अंतरआत्मा अपने गौरव में प्रकटेगा। भक्ति और साधना के कई तरीके होते हैं, गौरव भक्ति और भगवान का संबंध भक्ति। यदि भगवान को साक्षी मानकर भक्ति करते हैं तो राग, द्वेष, निंदा, ईष्र्या खत्म हो जाते हैं। शरीर के मरने से संबंध खत्म नहीं हो जाता, शरीर मरता है आत्मा सनातन है। वर्तमान का संबंध सच्चिदानंद परमात्मा से है जो वर्तमान में है और भविष्य में भी रहेगा। जिसका संबंध भगवान से हो गया उसे दवाओं के सहारे जीवन नहीं जीना पड़ेगा। जिसका जीवन जीवनदाता के साथ जुड़ा है तो वह स्वास्थ्य रहेगा ही। किताबों से ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती, पोथी पढ़-पढ़कर सफलता नहीं हासिल की जा सकती, यदि सत्संग के दिव्य वाणी ग्रहण कर लिया तो भगवान के प्रति प्रेम वैसे ही आ जाएगा। तब पान मसाला, सिगरेट और क्लबों में जीवन नष्ट नहीं करना पड़ेगा।



संत आसाराम बापू ने बताया कि दूसरों के हित की भावना से आत्म संतोष और आत्म तृप्ति होनी चाहिए, उन्होंने इस संबंध में द्रोपदी का प्रसंग भी सुनाया। संबंध में स्वीकार के लिए दोनों तरफ से सहमति की आवश्यकता होती है, अब यदि कोई यह सोचे कि उसे भगवान की सहमति चाहिए तो उन्हें यह जान लेना चाहिए कि भगवान पहले ही बोल चुके हैं और उनसे संबंध जोड़ चुके हैं कि सभी मेरे प्यारे हैं अब आपको तय करना है कि शाश्वत सत्य से संबंध रखना है या संसार के काल्पनिक माया से। उन्होंने कहा कि भविष्य में सुखी रहने की कल्पना कभी नहीं करेंगे, वर्तमान में कितना बड़ा भारी भी दुख आ जाए तो उसे भगा सकते हैं आप केवल इतना पक्का कर लें और आप उसे स्वीकार लें जो आपका परम मित्र है उसकी स्मृति मात्र से ही सारे दुख दूर हो जाएंगे। जीवन दाता से यदि जीवन धारा जुड़ी रहेगी तो ज्ञान का प्रकाश बढ़ेगा।


बापू ने गौरव भक्ति के संबंध में बताया कि हे प्रभु तेरी कैसी लीला है कि गाय और भैंस हरी घास खाकर सफेद दूध देती है, पानी से अंगुर की रस बनती है, अन्न खाने से रक्त-मांसपेशी मजबूत होती है यह गौरव भक्ति है। नित्य-नवीन रस प्रकट होगा, गौरव की स्मृति करके आप भगवान के गौरव से गौरन्वित हो सकते हैं। यदि गौरव भक्ति, भगवान का संबंध भक्ति होगी तो परमार्थ बढिय़ा होगा। भरोसा परमात्मा से करें संबंध परमात्मा से रखे, बहु-बेटे, मित्र, साथी, बेटी से यदि सुख मिलने का भरोसा रखते हैं तो खबरदार हो जाइये। बेटे-बेटियों को पढ़ाइये, लिखाईये ऐसे करके अपना कर्तव्य पूरा की जाए। भरोसा ईश्वर पर करें, वर्तमान ईश्वर स्वरुप आनंद पर करें, यदि स्विस बैंक में करोड़ों रुपये भी जमा हो तो भरोसा न करें। भारत जैसा सात्विक और अपनत्व वाला देश पूरे विश्व में कोई नहीं है। हजार वर्ष की तप से भी वह फल नहीं मिलता जो कि अपनत्व और परमात्मा से संबंध की स्वीकृति और विश्रांति से मिलता है।

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शाइनी ही बलात्कारी-तेरा क्या होगा अनुपमा प्यारी

शाइनी आहूजा को ही अंतत: अपनी नौकरानी से बलात्कार करने का दोषी पाया गया है। उनके डीएनए टेस्ट से यह बात साफ हो गई है कि शाइनी ने ही बलात्कार किया था। अब ऐसे में सोचने वाली बात यह है कि उनकी उस बड़बोली बीबी का क्या होगा जिन्होंने मीडिया के सामने दावा किया था कि उनके पति ऐसा कर ही नहीं सकते हैं।


जब शाइनी की नौकरानी का बयान आया था तभी यह बात तय हो गई थी कि शाइनी ने ही बलात्कार किया है। लेकिन कानून में जब तक सारे साक्ष्य सामने नहीं आते हैं किसी को दोषी नहीं कहा जा सकता है। वैसे अब भी इस बात का दावा नहीं किया जा सकता है कि शाइनी पर अदालत में आरोप साबित हो ही जाएगा। अपने देश की अदालतों में कुछ भी असंभव नहीं है। हो सकता है कि शाइनी को बचाने के लिए कोई तिक्कड़म निकालने का काम कर ही लिया जाए। यह तो बाद की बात है लेकिन वर्तमान में तो डीएनए टेस्ट के बाद यह बात साबित हो गई है कि शाइनी ने ही बलात्कार किया था।
डीएनए रिपोर्ट का खुलासा किया गया है जिसमें अतिरिक्त पुलिस आयुक्त अमिताभ गुप्ता ने कहा कि डीएनए रिपोर्ट में पीड़ित के साथ दुष्कर्म की पुष्टि हुई है। गुप्ता ने कहा कि रिपोर्ट के अनुसार प्राथमिकी में लगाए गए आरोपों की पुष्टि होती है कि अभिनेता ने अपनी नौकरानी के साथ दुष्कर्म किया था। इसके साथ ही रक्त और मूत्र के नमूनों से पता चलता है कि कथित अपराध के समय अभिनेता शराब या नशीली दवाइयों के प्रभाव में नहीं था। शाइनी अभी आर्थर रोड जेल में हैं।

उधर, रायगढ़ जिले में रोहा की रहने वाली पीड़ित की मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार उसके विभिन्न अंगों पर चोट के निशान थे। एक पुलिस अधिकारी के अनुसार पीड़ित का वजन सिर्फ 38 किलोग्राम है जबकि आहूजा का वजन 76 किलोग्राम है। ऐसे में आहूजा ने आसानी से नौकरानी को अपने कब्जे में कर लिया होगा। आहूजा ने एक सत्र अदालत में जमानत याचिका दायर की है। उन्होंने कहा कि याचिका पर सुनवाई प्रक्रिया के तहत होगी। आहूजा दो जुलाई तक न्यायिक हिरासत में हैं और उन्हें उसी दिन मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाएगा। अभिनेता ने अपनी जमानत याचिका में दलील दी है कि उससे आगे पूछताछ की जरूरत नहीं है और मामले में जरूरी सभी वैज्ञानिक परीक्षण पूरे हो गए हैं।


पुलिस अधिकारी ने जिस तरह से बताया है कि शाइनी की नौकरानी का वजन महज 38 किलो है और शाइनी का वजन 76 किलो है। ऐसे में शाइनी की पत्नी अनुपमा ही यह बताएं कि कैसे 38 किलो के वजन वाली लड़की उनके 76 किलो वाले पति के साथ बलात्कार कर सकती हैं, जैसा कि अनुपमा ने अपने बयान में कहा था कि महिलाएं भी बलात्कार कर सकती हैं। अब तो कम से कम उनको अपने बयान के लिए माफी मांग लेनी चाहिए और उनको शर्म करनी चाहिए कि उन्होंने बिना सोचे-समझे ऐसा बयान दिया था और पूरी नारी जाति को कटघरे में खड़ा करने का एक गुनाह किया था।

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सोमवार, जून 29, 2009

वेलेंनटाइन डे के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए

संत आसाराम बापू ने साधकों को सचेत करते हुए कहा कि यदि भारत बचेगा तो विश्व बचेगा, उन्होंने कुछ सामाजिक विकृतियों पर करारा प्रहार करते हुए कहा कि आज साढ़े बारह लाख कन्याएं स्कूल जाने से पहले गर्भवती हो जाती है। उन्होंने कहा कि वेलेंनटाइन डे के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए, प्यार या मोहब्बत को प्रदर्शित करने का यह एक गलत प्रदर्शन है। गणपति ने भी माता-पिता की पूजा की थी और जो प्यार उन्हें मिला वह एक शिक्षा है। माता-पिता की सेवा और प्रेम से बढ़कर कुछ भी नहीं है। केक काटकर, मोमबत्ती बुझाकर आप प्रकाश से अंधकार की ओर जाते हैं यदि जीवन में प्रकाश लाना है तो आप जितने वर्ष के हो चुके हैं उतने दिए भगवान के मंदिर में जलाए तो जीवन शक्ति में वृद्धि होगी। भगवान के लिए प्रसाद व भोग लगाकर बांटे तो ज्ञान, बुद्धि, कर्म सुखदायी होगा। दिव्य प्रेरणा से ही बच्चों में अच्छी भावनाएं जागृत होती है। संत आसाराम बापू ने कहा कि भगवत नाम में अद्भूत शक्ति है, आत्मा और परमात्मा का मिलन सत्संग से मिलता है। भगवान का नाम जिसके जीवन में जुड़ गया वह धनभाग है। अगर भगवान से जुड़े हंै तो भगवत नाम की अनुभूति भी करेंगे और अगर नहीं जुड़े हैं तो आप अनाथ है। इस जनम का क्या अगले जनम का पाप मिटाने की शक्ति भी भगवत मंत्र में हैं।

साइंस कालेज मैदान में दो दिवसीय सत्संग कार्यक्रम में संत आसाराम बापू मंच पर पहुंचे समूचा मैदान ऊँ नमो: भगवते वासुदेवाय से गूंज उठा और सैकड़ों-हजारों हाथ हरि ऊँ, हरि ऊँ के साथ साधक झूमने लगे। कुछ ही देर में बापू ने उन्हें शांत करते हुए कहा कि मिनी कुंभ है रायपुर, उन्होंने अपने अंदाज में पूछा क्या हाल है रायपुर वालों। आज के इस कार्यक्रम को हिन्दुस्तान के लोग ही नहीं बल्कि कनाडा, यू।के. जैसे और भी दर्जनों देशों के लोग वेबसाइट पर देख रहे हैं और इसके बाद उन्होंने एकाग्रचित लोगों को अपनी ओजस्वी वाणी में बांधा। उन्होंने कहा कि भगवत नाम में एक अद्भूत शक्ति है जो हर प्रकार की दुर्बलताओं को भगा देता है। जिनके जीवन में गुरु मंत्र होता है उन्हें यह अहसास रहता है कि उसके पीछे कर्नल, बिग्रेडियर जैसे मजबूत आश्रय है। यदि कोई भय दिखाता है तो इस अद्भूत शक्ति मात्र से भय दिखाने वाले के बंदूक की गोली खत्म हो जाती है लेकिन भगवत नाम का उच्चारण नहीं। उन्होंने कहा कि थोड़ा सा धन या पद मिले तो लोगों के मन में अहंकार आ जाता है, लोभ, मोह, क्रोध नहीं करना चाहिए, धन या बुद्धि का गर्व न करें। उन्होंने उपस्थित जनप्रतिनिधियों की ओर संकेत करते हुए कहा कि अटल बिहारी वाजपेेयी जैसे लोग भी उनके सत्संग में एक सामान्य आदमी की तरह बैठे है और एक अच्छे आदमी के उन्नत होने के लिए यही सही है।


भगवान का नाम जिसके जीवन में जुड़ा है वह धनभाग है, अगर आप भगवान से जुड़े है तो ही इसकी अनुभूति करेंगे और अगर नहीं तो आप अनाथ है। यदि भगवान से जुड़े है, जुड़े रहेंगे तो साथ नहीं झूठता और आपका बेड़ा पार है। ज्ञान, प्रेम, चेतना सत्संग से ही मिलता है, आत्मा-परमात्मा का मिलन भी सत्संग से मिलता है। आत्मा परमात्मा है, भगवत शक्ति, भक्ति, प्रेम को लाने से ही यह मिलता है। दुनिया का कोई भी स्कूल या कालेज वह प्रमाण पत्र नहीं दे सकता जिससे वह आनंद मिलता हो जितना कि सत्संग में आने से मिलता है। उन्होंने चुटीले अंदाज में कहा कि यदि मैं झूठ बोलूं तो तुम मरो। मंत्रों की अपनी अलग शक्ति होती है विभिन्न मंत्रों की शक्ति और महिमा उन्होंने साधकों को बताई। मंत्र के साथ-साथ प्राणायाम के फायदे उन्होंने गिनाए तथा प्रत्यक्ष रुप से प्राणायाम कराकर उसकी विधि भी उन्होंने बताई।

बापू ने दवाओं को भूकंप से भी ज्यादा घातक बताया, उन्होंने कहा कि मंत्र में इतनी शक्ति है कि ब्लडप्रेशर, हार्ट अटेक से भी बचा जा सकता है। अंग्रेजी दवाओं का उपयोग कर लोग मर जाते है। मंत्रों में आत्मिक शक्ति है पीड़ा से दवा कुछ राहत जरुर पहुंचा सकती है लेकिन रोग नहीं भगा सकती। रोग भगाने का हथियार गुरु मंत्र से ही मिलेगा इसलिए कहा गया है ''नाशै रोग हरै सब पीड़ा, जपत निरंतर हनुमंत वीरा। तिलक लगाने की जगह पर ओमकार का ध्यान करें तो बुद्धि विकसित होगी। निर्भय गुरु नाम के मंत्र का आश्रय है। नियम-निष्ठा यदि जीवन में रखें तो भय, रोग, शोक, चिंता, पाप दूर हो जाते है। ईश्वर की कामना मात्र से आपकी चेतना एकाग्र होगी।

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साहब गांव में नक्सली आएं हैं... तो हम क्या करें बे....

बस्तर के पुलिस कंट्रोल रूम का फोन बजता है... उधर के किसी थाने का एक अदना सा सिपाही जानकारी लेता है कि साहब एक गांव में नक्सली आएं हैं। कंट्रोल रूम में बैठा अधिकारी पलटकर जवाब देता है कि तो हम क्या करें बे। और फोन फटक देता है। ऐसा एक बार नहीं बार-बार हो रहा है और नक्सल प्रभावित थानों के सिपाहियों से अगर पूछा जाए तो उनका यही जवाब मिलेगा कि जब भी किसी नक्सली के बारे में पुलिस कंट्रोल रूम में सूचना देने के लिए फोन करते हैं और फोर्स भेजने की बात करते हैं तो फोन पटक दिया जाता है और कंट्रोल रूम से कोई मदद नहीं मिलती है। ऐसे में थानों को भी या तो चुप बैठना पड़ता है या फिर थाने वाले ज्यादा ईमानदारी दिखाते हुए उस गांव में जाने की गलती करते हैं तो मारे जाते हैं।

पूरे देश में इस समय सबसे ज्यादा नक्सली समस्या का सामना छत्तीसगढ़ के बस्तर को करना पड़ रहा है। यहां पर अगर यह समस्या है तो इसके पीछे कारण भी कई हैं। एक कारण यह है कि यहां के अधिकारियों में इस समस्या से निपटने की इच्छा शक्ति है ही नहीं। एक छोटा है उदाहरण है कि जब भी किसी नक्सल प्रभावित थाने से कंट्रोल रूम में फोन आता है तो कंट्रोल रूम में बैठने वाले अधिकारी उस फोन पर आई सूचना को गंभीरता से लेते ही नहीं है और उल्टे जिस थाने से फोन आता है उस फोन करने वाले बंदे को डांट दिया जाता है। कोई ज्यादा ईमानदारी दिखाने की कोशिश करता है तो उसको जवाब मिलता है कि ... अबे साले जा ना तेरे को मरने का शौक है तो, हमारे तो बीबी-बच्चे हैं, हमें नहीं खानी है नक्सलियों की गोलियां। अब जहां पर कंट्रोल रूम से ऐसे जवाब मिलेंगे तो छोटे से थाने का अमला क्या करेगा? जब किसी थाने को फोर्स की मदद ही नहीं मिलेगी तो वे क्या बिगाड़ लेगे नक्सलियों का? नक्सली यह बात अच्छी तरह से समझ गए हैं कि नक्सल क्षेत्र में काम करने वाली पूरी पुलिस फोर्स नपुंसक हो गई है और उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकती है। ऐसे में उनके हौसले बढ़ते जा रहा है।


इसमें कोई दो मत नहीं है कि नक्सली क्षेत्र की पुलिस नपुंसक हो गई है। इसके पीछे का कारण देखा जाए तो वह यह है कि नक्सली क्षेत्र में काम करने वाले अधिकारियों में इतना दम नहीं है कि अपनी पुलिस फोर्स का हौसला बढ़ा सके। हमारे एक मित्र हैं वे काफी समय तक बस्तर में एसपी रहे। उनके जमाने की बात करें तो उन्होंने अपनी फोर्स का हौसला इस तरह से बढ़ाया कि वे नक्सलियों से भिडऩे के लिए खुद चले जाते थे। यही नहीं उन्होंने गांव-गांव में इतना तगड़ा नेटवर्क बना रखा था कि कोई भी सूचना उन तक आ जाती थी। आज भी स्थिति यह है कि वे राजधानी में बैठे हैं लेकिन उनके पास सूचनाएं बस्तर में बैठे हुए अधिकारियों से ज्यादा आती हैं। इधर बस्तर में आज की स्थिति की बात करें तो, काफी लंबा समय हो गया है कि बस्तर की कमान संभालने वाला कोई एएपी नक्सलियों से भिडऩे जाता नहीं है। अब कप्तान खुद ही मांद में छुपकर बैठेगा तो फिर उनके खिलाड़ी कैसे अकेले जाकर जंग जीत सकते हैं। जब तक खिलाडिय़ों को गाईड नहीं किया जाता है कोई मैच जीता नहीं जा सकता है। यही हाल आज बस्तर का है। बस्तर को कोई ऐसा कप्तान ही नहीं मिल रहा है जो मैदान में आकर काम करे। बस कमरे में बैठकर निर्देश दिए जाते हैं कि ऐसा करो-वैसा करो। अब बेचारे टीआई और सिपाही ही मोर्चे पर जाते हैं और मारे जाते है। जब तक बस्तर के आला अधिकारियों में उन एसपी की तरह नक्सलियों को खत्म करने की रूचि नहीं होगी, नक्सल समस्या का कुछ नहीं किया जा सकता है। हर रोज यही होगा कि थानों से फोन आएंगे और कंट्रोल रूम वाले फोन पटक कर सो जाएंगे और उधर नक्सली गांवों अपना नंगा नाच करते रहेंगे।

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रविवार, जून 28, 2009

मुख्यमंत्री से मिलना सहज-अधिकारी हैं निर्लज

त्तीसगढ़ के राजा यानी मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के निवास में पूरे प्रदेश से काफी दूर-दूर से गरीब और असहाय लोग अपनी फरियाद लेकर आए हैं और मुख्यमंत्री के सामने अपनी समस्याएं रख रहे हैं। मुख्यमंत्री उनको सुनने के बाद जिनका निवारण तत्काल हो सकता है कर रहे हैं बाकी के लिए संबंधित अधिकारियों तक कागज चले जाते हैं। यह नजारा हर गुरुवार को जनदर्शन कार्यक्रम में नजर आता है। एक तरफ प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं जो बड़ी सहजता से कम से कम सप्ताह में एक दिन प्रदेश की जनता को मिल तो जाते हैं, लेकिन दूसरी तरफ अगर कोई अपनी शिकायत या फिर छोटा सा काम लेकर जिले के राजा यानी कलेक्टर के पास जाता है तो कलेक्टर से मिलना किसी के लिए आसान नहीं होता है। कलेक्टर के दफ्तरों में उन्हीं शिकायतों पर ध्यान दिया जाता है जिन शिकायतों के पत्रों में सांसदों या फिर विधायकों के हस्ताक्षर रहते हैं या फिर उनके पत्र रहते हैं। कुल मिलाकर छत्तीसगढ़ में यह नजारा है कि मुख्यमंत्री से मिलना जितना सहज है अधिकारियों से मिलना उतना ही कठिन है, कारण साफ है कि अधिकारी तो पूरी तरह से निर्लज हो गए हैं। उनको अपने मुख्यमंत्री को देखकर भी शर्म नहीं आती है।

प्रदेश में एक बार फिर से भाजपा की सरकार बनी है तो इसके पीछे सबसे बड़ा कारण प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की वह छवि रही है जिसके कारण से भाजपा को सत्ता में वापस आने का मौका मिला है। यह बात भाजपा भी जानती थी कि अगर डॉ. रमन सिंह के स्थान पर और किसी को सीएम प्रमोट किया जाता तो भाजपा का यहां बाजा बज जाता। ऐसा नहीं हुआ और एक बार फिर से छत्तीसगढ़ के राजा डॉ. रमन सिंह हंै। रमन सिंह ने अपनी दूसरी पारी में भी अपना वह काम बरकरार रखा है जिसके कारण उनको प्रदेश की जनता ने फिर से अपना राजा माना है। इसमें कोई दो मत नहीं है कि प्रदेश में रमन सिंह ने जिस तरह से ग्राम सुराज अभियान चलाया है और गांव-गांव जाकर पेड़ों के नीचे चौपाल लगाकर लोगों की समस्याएं सुनीं हैं और उन समस्याओं का तत्काल निवारण भी किया है जिसके कारण उनकी छवि जनता के बीच में काफी अच्छी बनी है। रमन सिंह अपनी इस छवि को बनाए रखने का काम कर भी रहे हैं। आज उनके जनदर्शन कार्यक्रम में जितनी भीड़ लगती है और जिस सहजता से वे लोगों से मिलते हैं, उसकी तारीफ ही करनी होगी। वैसे अगर जनता ने आपको मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठाया है तो आपको जनता की फरियाद तो सुननी ही चाहिए। अगर आप ऐसा नहीं करते हैं तो जनता आपको नकारने से पीछे नहीं रहेगी। इस बात को कम से कम रमन सिंह जरूर अच्छी तरह से जानते हैं।

अब यह अपने राज्य का दुर्भाग्य है कि जिस राज्य के मुखिया इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं कि उनको राज्य की जनता की फरियाद सुननी चाहिए, उस राज्य के अधिकारी इस बात को बिलकुल नहीं मानते हैं कि उनको जनता के काम आना चाहिए। आज देश के हर विभाग का हर अधिकारी लगता है यह बात भूल गया है कि उनको जनता के भले के लिए ही किसी भी पद पर बिठाया गया है, लेकिन वे जनता का भला कम और अपना भला ज्यादा करने में लग गए हैं। अब अधिकारी अपना भला कैसे करते हैं यह अलग मुद्दा है और इस पर लंबी-चौड़ी बहस हो सकती है। फिलहाल बात यह है कि जिस राज्य का मुख्यमंत्री आम जनता को आसानी से उपलब्ध हो जाता है, उस राज्य में एक कलेक्टर से मिलना किसी भी आदमी के लिए काफी मुश्किल काम है। अगर कलेक्टर के पास आपको कोई काम कराने जाना है तो मजाल है कि वह आपको आसानी से मिल जाएं।

कलेक्टर सहित ऐसे किसी भी अधिकारी का जनता से मिलने का कोई समय नहीं है जिनका जनता से सीधेे सरोकार है। कई बार चक्कर लगाने के बाद यदि कलेक्टर महोदय दफ्तर में होंगे भी तो कोई आम गरीब आदमी उन तक अपनी फरियाद लेकर जा भी नहीं सकता है। प्रदेश के हर जिले के कलेक्टरों के दफ्तरों में शिकायतों का इतना अंबार रहता है जिसकी कोई सीमा नहीं है। इन शिकायतों में से महज चंद उन्हीं शिकायतों पर कार्रवाई हो पाती है जिन शिकायतों के पत्रों में सांसद या फिर विधायकों के हस्ताक्षर होते हैं या फिर उनके पत्र साथ रहते हैं। कुल मिलाकर यही बात लगती है कि अपने राज्य के सारे अधिकारी निर्लज हैं, उनको इस बात से शर्म भी नहीं आती है कि जिस राज्य के मुख्यमंत्री सीधे जनता से बात करने का काम करते हैं, उसी राज्य में वे जनता से सीधे मुंह बात करना तो दूर उनको उपलब्ध भी नहीं होते हैं। मुख्यमंत्री को तो ऐसे सारे अधिकारियों को अपने जनदर्शन की तरह ही दरबार लगाने के निर्देश देने चाहिए ताकि किसी भी गरीब की समस्या का निवारण तत्काल हो सके। अगर ऐसा हो गया तो फिर छत्तीसगढ़ एक मिसाल कायम कर देगा।

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शनिवार, जून 27, 2009

शाइनी की तो लग गई वाट..

बलात्कार के आरोप में फंसे फिल्म स्टार शाइनी आहूजा की वाट लगनी अब तय हो गई है। नौकरानी ने जज के सामने जो बयान दिया और मेडिकल रिपोर्ट में जिन बातों का खुलासा हुआ है उसके बाद उनका बचना कठिन है। ऐसे में यह बात भी है कि अब उनकी बड़बोली पत्नी अनुपमा आहूजा का क्या होगा। उन्होंने कुछ समय पहले काफी आत्मविश्वास के साथ मीडिया के सामने यह दावा किया था कि उनके पति बेकसूर हैं और उनको फंसाया जा रहा है। अनुपमा ने तो यहां तक कह दिया था कि महिलाएं बलात्कार क्यों नहीं कर सकती हैं। उनके कहने का सीधा सा मतलब यह था कि उनके पति ने नौकरानी का बलात्कार नहीं किया है, बल्कि उनका बलात्कार हुआ है। अब यह बात साफ हो गई है कि शाइनी ने ही बलात्कार किया था और उनकी नीयत बहुत पहले से अपनी नौकरानी पर थी। नौकरानी की मेडिकल रिपोर्ट के साथ उनका जज के साथ दिया गया बयान इस बात के पुख्ता सबूत हैं कि शाइनी ने बलात्कार किया है। अब ऐसे में सोचने वाली बात यह है कि अनुपमा का क्या होगा। पति का पक्ष लेना अच्छी बात है लेकिन पति के ऊपर अंधा विश्वास करना घातक ही होता है और अनुपमा के साथ यही हुआ है।

शाइनी आहूजा मामले में उनके चाहने वालों के लिए एक बुरी खबर यह है कि शाइनी पर अब बलात्कार का आरोप साबित होना तय है। इसी के साथ यह भी तय हो गया है कि शाइनी की नीयत अपनी नौकरानी पर काफी पहले से खराब थी। नौकरानी ने अदालत में अपनी मौसी के साथ जाकर जो बयान दिया है उस पर गौर करने से साफ हो जाता है कि शाइनी ही बलात्कारी हैं। बकौल नौकरानी शाइनी ने बलात्कार के एक दिन पहले यानी 13 जून को उसको एक टंकी का ढक्कन खोलने के लिए स्टूल पर चढऩे को कहा था। नौकरानी जैसे ही स्टूल में चढ़ी शाइनी ने उसे दबोचने के कोशिश की थी, तब नौकरानी ने उनको छूने से मना किया था। इसके अगले दिन ही शाइनी ने उसको पानी देने के बहाने अपने बेडरूम बुलाया और अपनी मनमर्जी करने में सफल हो गया। शाइनी ने नौकरानी के मुंह में तकिया रख दिया था जिससे वह चिल्ला न सके।


एक तरफ शाइनी की नौकरानी का जज के सामने अदालत में दिया गया यह बयान है तो दूसरी तरफ उसकी मेडिकल रिपोर्ट भी है जिससे यह साबित होता है कि उसके साथ बलात्कार हुआ है। मेडिकल रिपोर्ट के मुताबिक नौकरानी को जब पहले दिन मेडिकल जांच के लिए ले जाया गया था तो डॉक्टरों ने देखा कि गुप्तांग में इतनी ज्यादा सूजन है कि उनकी जांच ही नहीं की जा सकती है, ऐसे में उसको पांच दिन बाद लाने के लिए कहा गया। नौकरानी ने अपने को बचाने के लिए जो विरोध किया जिसके कारण शाइनी की बाई कलाई में और अंगुलियों में चोट है, इस बात का खुलासा भी मेडिकल रिपोर्ट में हो चुका है। अब इतने सबूत के बाद यह सोचना मुश्किल है शाइनी बच सकता है।

शाइनी के मामले में इन सब बातों के खुलासे के बाद सबसे ज्यादा तरस उनकी पत्नी अनुपमा पर आ रहा है जिन्होंने काफी जोर-शोर से यह साबित करने की कोशिश की थी कि उनके पति तो सत्यवादी राजा हरिशचन्द्र जैसे हैं। बकौल अनुपमा शाइनी ऐसा कर ही नहीं सकते हैं। न तो वे शराब पीते हैं, न कोई नशा करते हैं फिर भला वे बलात्कार कैसे कर सकते हैं? अब यह अनुपमा को कौन समझाए कि बलात्कार करने के लिए किसी नशे की जरूरत नहीं होती है। बलात्कार करने की मानसिकता ही अपने आप में खतरनाक नशा है। जिस इंसान के दिमाग में इतना घिनौना नशा घर कर गया हो उसको और किसी नशे की जरूरत क्या है। अरे मैडम कुछ बोलने से पहले कम से कम अपने पति के उस बयान पर ही गौर कर लिया होता जिसमें उन्होंने कहा था कि सेक्स नौकरानी की सहमति से हुआ था।

शाइनी को यह बात मालूम थी कि शायद वे ऐसा बोलकर बच सकते हैं। संभवत: शाइनी को इस बात का भरोसा रहा होगा कि वे पैसों के दम पर नौकरानी का बयान इस तरह से दिलवाने में सफल हो जाएंगे। लेकिन फिलहाल वे ऐसा नहीं कर पाएं हैं। हो सकता है आगे ऐसा कुछ हो जाए। इस दुनिया में कुछ भी असंभव नहीं है। लेकिन फिलहाल तो यह बात है कि आखिर अनुपमा का क्या होगा? जिन्होंने पूरी नारी जाति को ही कटघरे में खड़ा करते हुए कह दिया था कि महिलाएं बलात्कार क्यों नहीं कर सकती है? अब शाइनी के मामले में सबूत आने के बाद उनको बताना चाहिए कि अब उनका क्या कहना है। अब तो हर किसी का ऐसा मानना है कि बलात्कार के मामले में न सिर्फ शाइनी को कड़ी सजा मिलनी चाहिए, बल्कि अनुपमा को अब तो सामने आकर नारी जाति से क्षमा मांग लेनी चाहिए। लेकिन हमको नहीं लगता है कि वह ऐसा कुछ करेंगी। वह तो अब भी अपने पति को बचाने के लिए कुछ भी तिकड़म करने में जुटीं होंगी, आखिर वह एक पत्नी हैं और भी अपने पति पर अंधा विश्वास करने वाली पत्नी। फिर अगर उनके सामने भगवान भी आकर कह दें कि उनका पति दोषी है तो वह क्यों कर मानने लगीं। उनका पति तो खुद परमेश्वर है फिर किसी दूसरे परमेश्वर की बात क्यों मानी जाए।

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शुक्रवार, जून 26, 2009

पोस्ट का नाबाद तिहरा शतक

हमारे एक मित्र ने कल रात को मोबाइल की घँटी बचाई और जब बातों का सिलसिला प्रारंभ हुआ तो उन्होंने कहा कि यार तू कौन से जमाने में जीता है और कौन सी मिट्टी का बना है। बात हमारी समझ में आई नहीं हमने कहां अबे सीधे-सीधे बक न क्या बकना चाहता है। फिर उसने घुमाने वाली कही कि तुम साले सुधर नहीं सकते जैसे कॉलेज के जमाने में थे, वैसे ही अब भी हो। आखिर हो न अलग टाइप के पत्रकार। हमने कहां बहुत हो गया यार सीधे-सीधे बताते हो या हम काट दें मोबाइल। हमारा ऐसा बोलना था कि वो आ गया लाइन पर और उसने जो बात बोली वह बात ठीक तो है, पर हम क्या करें हमारी ऐसी आदत नहीं है कि हम जो करें उसके बारे में बोलें। दरअसल हमारे कॉलेज के वे मित्र हमारे ब्लाग की बात कर रहे थे और उन्होंने ही हमारा ध्यान इस तरफ दिलाने का प्रयास किया कि हमारे ब्लाग राजतंत्र और खेलगढ़ को मिलाकर पोस्ट का नाबाद तिहरा शतक कब का हो चुका है।

हमारे मित्र ने जब यह बात कही तो हमने उससे कहा कि तो क्या हो गया अगर नाबाद तिहरा शतक पूरा हो गया है। क्या अपने वीरेन्द्र सहवाग के पेट में दर्द हो रहा है या फिर अपने ब्रायन लारा को डर लगने लगा है कि कहीं उनका पांच सौ का रिकॉर्ड न टूट जाए। वैसे तुम जानते हो कि हम लिखेंगे तो पांच सौ क्या एक हजार रनों का भी रिकॉर्ड टूट सकता है। और रही बात यह सब बताने की तो इसमें बताने वाली क्या बात है। यह तो सबको दिख रहा है कि हमारी कितनी पोस्ट हो गई है। इस पर उसने तपाक से कहा अबे गधे तू कब सुधरेगा, आज के जमाने में बिना बताए किसी को कुछ मालूम नहीं होता है। और अगर मालूम होता भी है तो कोई बताता नहीं है। हमने कहा कि फिर तू क्यों राग अलाप रहा है कि हमारी पोस्ट का नाबाद तिहरा शतक हो गया है और लिखने की गाड़ी पूरी रफ्तार से दौड़ी जा रही है।

अरे यार तेरे से बात करना ही मूर्खता है। अबे में तूझे इसलिए बता रहा हूं क्योंकि कोई चाहे या न चाहे लेकिन मैं तेरा सबसे अच्छा और पुराना दोस्त होने के नाते चाह रहा हूं कि तू एक पोस्ट लिखे जिसमें यह बताए कि तेरी पोस्ट का नाबाद तिहरा शतक पूरा हो गया है। मैंने कहा कि अगर न लिखूं तो। उसने कहा कि कैसे नहीं लिखेगा बे.. जब सब लिखते हैं तो तूझे लिखने में क्या परेशानी है। मैंने कहा क्या जो सब लोग करते हैं वह करना जरूरी है। उसने कहा कि दिक्कत क्या है। हमने कहा कि दिक्कत-विक्कत कुछ नहीं है, यार तू तो जानता है कि मुझे यह सब पसंद नहीं आता है। तूझे क्या लगता है कि क्या मुझे मालूम नहीं था कि मेरी कब 100वीं पोस्ट खेलगढ़ में पूरी हुई फिर 200 वीं पोस्ट हुई अब खेलगढ़ ही तिहरे शतक की तरफ चल पड़ा है। राजतंत्र में भी शतक कुछ समय पहले पूरा हुआ है।

लेकिन इन बातों को बताने से फायदा क्या है। मित्र ने कहा फायदा-वायदा तो मैं नहीं जानता, लेकिन मैंने कई लोगों को देखा है बताते हुए कि आज की पोस्ट उनकी 100वीं पोस्ट है। बस मैं भी चाहता हूं कि तू भी ऐसा कर। लेकिन तू बताएगा इससे क्या होगा क्या? अरे यार तू अपने बारे में नहीं तो कम से कम मेरे बारे में तो सोच। जैसे मैं कॉलेज के जमाने में अपने मित्रों को बताता था कि देखो मेरे मित्र राजकुमार का लेख उस अखबार में छपा है या जब तुमने शुरू में अखबार में काम करना प्रारंभ किया था तब मैं कैसे दोस्तों को बताता था कि देख यार राजकुमार ने क्या मस्त रिपोर्ट छापी है। बस मैं चाहता हूं कि तू अपने ब्लाग के बारे में लिखे तो मैं आज भी उसी तरह से अपने दोस्तों तो यह बताऊं कि देखो मेरे दोस्त राजकुमार ने ब्लाग में पोस्ट का नाबाद तिहरा शतक पूरा कर लिया है। क्या तू अपने दोस्त की इतनी सी बात नहीं मान सकता है। चल ठीक है हम तेरी बात मान लेते हैं, लेकिन पहली और आखिर बार होगा, इसके बाद तू फिर मुझे यह मत कहना कि अब हम 400 और 500 पोस्ट होने की बात भी लिखूं। उसने कहा ठीक है न बे, पहले तू एक बार लिख तो सही।

अब दोस्त ने इतने अधिकार से यह बात कही थी तो लिखना ही था, सो हमने भी लिख दिया कि पोस्ट में हमारा नाबाद तिहरा हो चुका है और अभी हम ब्लाग की क्रीज पर टडे हुए हैं। वैसे आउट होने वाले बल्लेबाज तो हम हैं नहीं। हो सकता है कि किसी कारण से ब्रेक लेना पड़ जाए, वैसे अब तक ऐसी नौबात आई नहीं है। और भगवान न करे ऐसी नौबात आए। हम तो अपनी जिंदगी की अंतिम सांस तक कुछ ऐसा लिखने की तमन्ना रखते हैं जिससे किसी न किसी का भला हो। किसी का दिल दुखे ऐसी कोई पोस्ट हम कभी भी लिखना पसंद नहीं करेंगे।

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गुरुवार, जून 25, 2009

ब्लाग बिरादरी तो जानती है गांधी जी की मां का नाम

महात्मा गांधी जिनको पूरा देश राष्ट्रपिता के नाम से जानता है। उनको जन्म देने वाली जननी के नाम से अपने देश के लोगों का अनजान रहना वाकई में दुखद है। हमने ब्लाग बिरादरी से एक प्रश्न किया था कि महात्मा गांधी की मां का नाम क्या है ? ब्लाग बिरादरी के काफी मित्रों ने जरूर इसका जवाब दिया। पर जवाब देने वालों की संख्या कम रही। लेकिन यह बात कम से कम इसलिए संतोषप्रद है कि जब छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में कॉलेज के प्रोफेसरों के साथ अन्य विभागों के अधिकारियों से यही सवाल किया गया था तो कोई जवाब देने वाला नहीं था। एक प्रोफेसर ने काफी संकोच के साथ जवाब दिया था।

इसमें कोई दो मत नहीं है कि अपने देश का जनरल नॉलेज उद्योग काफी बुरी स्थिति में है। यही वजह है कि लोग यह भी नहीं जानते हैं कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की मां का नाम क्या है। हमने ब्लाग बिरादरी के सामने यह प्रश्न रखा था और हमें इस बात की खुशी है कि ब्लाग बिरादरी के काफी मित्र गांधी जी की मां के नाम से अनजान नहीं हैं। वरना आज की युवा और पुरानी पीढ़ी में बहुत कम लोग पुतलीबाई का नाम जानते हैं। अक्सर यही होता है कि जब किसी से महात्मा गाँधी की मां का नाम पूछा जाता है तो लोग बेबाकी से कस्तूरबा गांधी कह देते हैं। ऐसे लोगों की अक्ल पर तरस आता है।

हमारे इसी सवाल को चिट्ठा चर्चा में शामिल करने का आज काम किया गया है वहां पर काफी विस्तार से इस मुद्दे पर चर्चा कर की गई हैं। देखें चिट्ठा चर्चा में यह चर्चा।

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पंगेबाज बने प्रिंस पहेली के सरताज

प्रिंस पहेली का तिलस्म तोडऩे में पंगेबाज सफल रहे और वे प्रिंस पहेली के सरताज बने। हमें ऐसा लगता था कि इस पहेली का तिलस्म तोडऩे में शायद ही कोई सफल होगा। कारण साफ था आज से करीब 23 साल पहले जब हम कॉलेज में थे तो इस पहेली का हल अच्छे-अच्छे प्रोफेसर नहीं बता पाए थे। यही वजह रही कि हमने एक सप्ताह का समय दिया है, हल के लिए। चलो अच्छा है कि आज हमारी ब्लाग बिरादरी इतनी ज्यादा समझदार है कि किसी भी तिलस्म को तोडऩे में वक्त नहीं लगाती है। इस पहेली के कारण कुछ हंसी-मजाक का भी माहौल बना।


उडऩ तश्तरी के भाई समीर लाल जी ने कहा- सी बी आई का मामला दिखता है. हमारी तो यही सलाह है कि आप भी हाथ न डालो. सालों साल का चक्कर बैठ जायेगा और उपर से लाई डिटेक्टर और ब्रेन मैपिंग का पंगा-पता चला पहेली के चक्कर में कोई दूसरा केस उगल आये तो अन्दर ही न हो जाओ.बात चीत करके मामला सलटा लो. कहाँ तौला ताली के चक्कर में पड़ रहे हो.

समीर लाल जी की इस बात का समर्थन किया अपने ताऊ रामपुरिया ने कहा कि- भाई जरा समीरजी की बात पर ध्यान दिया जाये.:)
अपने अनिवाश वाचस्पति ने हल करने के एवाज में एक सोने का हार ही मांग डाला। जब हमने उन्हें इससे ज्यादा कीमती प्यार और स्नेह का हार देने का ऑफर दिया तो उनका जवाब आया- मतलब चाहे जीतें पर आप देंगे हार ही फिर हम क्‍यों करें स्‍वीकार जी जीतकर पहनते तो क्‍या होता हमने हार कर पहन लिया हार जी जय हो मनता रहे रोजाना पहेलियों का त्‍योहार जी। कासिफ अरीफ ने कहा- क्या बात है आज कल सब पहेली ही पहेली पूछ रहें है...अभी मुड नही है बाद मे जवाब देंगे। और कई लोगों ने अपने-अपने अंदाज में अपनी बात कही।
गुरु ने हमेशा की तरह अपने अंदाज में कहा- बड़ी दूर की कौड़ी लाए हैं गुरु
भाई अनिल पुसदकर ने सबसे पहले यह कहते हुए किनारा कर लिया कि- तुम तो जानते हो राजकुमार गणितबाज़ी से अपन शुरू से ही दूर रहते आयें है।
वाकई अपने अनिल जी गणितबाजी से दूर ही रहने वाले प्राणी है। बहरहाल प्रिंस पहेली के कारण कुछ हंसी-मजाक का माहौल तो बना। वैसे भी हंसी की फसल आज के जमाने में उगती कहा है। और इंसान किसी को हंसाने का काम करे उससे अच्छा इंसान तो इस दुनिया में हो नहीं सकता है। चलिए फिर मौका मिला तो प्रिंस पहेली में ऐसा ही कोई सवाल फिर से दागा जाएगा और देखेंगे कि कौन तोड़ेगा उस सवाल का तिलस्म। फिलहाल तो पंगेबाज को दी जाए बधाई जिन्होंने एक सप्ताह से सस्पेंस को एक दिन में ही समाप्त कर दिया। बहुत-बहुत बधाई भाई पंगेबाज। उम्मीद है आप इसी तरह से पंगे लेते रहेंगे और मचलते रहेंगे।

चलते-चलते सही जवाब पर नजरें डाल लें जो पंगेबाज ने दिया है-

पहले सुनार का एक, दूसरे के दो, तीसरे के तीन, चौथे के चार, पांचवे के पांच, छठवे के छ्ह, सातवें के सात, आठवे के आठ नवें के नौ और दसवें के दस हार लेकर एकसाथ तौल लोकुल हार हुए 55 यानी कुल वजन होना चाहिये 550 तोला...यदि इसका वजन 549 आये तो पहला, 548 तो दूसरा, 547 तो तीसरा, 546 तो चौथा, 545 तो पांचवा, 544 तो छठा, 543 तो सातवां, 542 तो आठवां, 541 तो नवां, 540 तो दसवां सुनार बेईमान है

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बुधवार, जून 24, 2009

महात्मा गांधी की मां का नाम क्या है?

मोहनदास करमचंद गांधी यानी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को अपना देश लगता है भूलता ही जा रहा है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के जिस समाचार पत्र दैनिक हरिभूमि में हम काम करते हैं, कुछ समय पहले उसके संपादक की पहल पर राजधानी के कॉलेजों के प्रोफेसरों के साथ शिक्षा विभाग से जुड़े लोगों के अलावा और कई विभागों के अफसरों से एक सवाल किया गया था कि महात्मा गांधी की मां का नाम क्या है? अफसोस 99 प्रतिशत लोगों को यह मालूम ही नहीं है कि महात्मा गांधी की मां का नाम क्या है। एक प्रोफेसर ने काफी संकोच के साथ उनका नाम बताया था जो कि सही था। एक तरफ पुरानी और युवा पीढ़ी को जहां महात्मा गांधी की मां का नाम मालूम नहीं है, वहीं छोटे बच्चों को जरूर यह मालूम है। अंग्रेजी माध्यम में पढऩे वाले बच्चे भी नाम जानते हैं। हमने छठी क्लास में पढऩे वाली अपनी बिटिया स्वप्निल से ही पूछा तो उसने तपाक ने नाम बना दिया। अब देखने वाली बात यह है कि हमारी ब्लाग बिरादरी के कितने लोग यह जानते हैं कि महात्मा गांधी की मां का नाम क्या है। अगर आप जानते हैं तो जरूर बताएं।

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प्रिंस पहेली....

हम राजतंत्र के रायपुर के अंतरराष्ट्रीय चैनल से इस चैनल के मेजबान राजकुमार यानी की प्रिंस लिख रहे हैं। हम आज आपको ले जाने वाले हैं पहेली की एक ऐसी दुनिया में जिसका नाम हमने काफी सोचने के बाद प्रिंस पहेली रखा है। यह पहेली हमारी तब की धरोहर है जब हम कॉलेज में पढ़ते थे। तब हमने इस पहेली को कई लोगों के सामने रखा था, पर इसका जवाब नहीं मिल पाया था। आज जब हम ब्लाग जगत से जुड़े हैं और देख रहे हैं कि यहां पर धड़ाधड़ पहेलियों का दौर चल रहा है तो सोचा क्यों न हम भी एक ऐसी पहेली सबके सामने रखे दें जो सबके दिमाग की दही जमा दे। तो तैयार हो जाएं अपने दिमाग के घोड़ों को दौडऩे के लिए क्योंकि अब आने वाली है आपके सामने प्रिंस पहेली जिसका हल बताना आसान नहीं है। हम पहेली के हल के लिए फिलहाल एक सप्ताह का समय तय कर रहे हैं। आपको अपने दिमाग के घोड़ों को एक सप्ताह तक दौडऩा है। जब आपके दिमागी घोड़े मंजिल तक नहीं पहुंच पाएंगे तब हम बताएंगे आपको प्रिंस पहेली का हल। तो चले सवाल की तरफ....हमारा सवाल है...

हमें सोने के 100 हार बनवाने हैं।

हर हार होगा 10-10 तोले का।

हमें हार चूंकि जल्द चाहिए ऐसे में हम हार एक सोनार के स्थान पर 10 सोनारों को बनाने देते हैं।

एक-एक सोनार को दिए जाते हैं 10-10 तोले के 10-10 हार बनाने के लिए।

लोचा तब होता है जब हारों की डिलवरी के एक दिन पहले पता चलता है कि एक सोनार चोरी कर रहा है और 10 की बजाए 9-9 तोले के हार बना रहा है।

अब आपको उस चोर को पकडऩा है। चोर को पकडऩे के लिए हर सोनारे के हारे तौलने से ही चोर को पकडऩे का आसान तरीका है। लेकिन चोर को पकडऩे के लिए आपको हारों को एक बार तोलकर ही उस चोर को पकडऩा है। याद रहे तोल सिर्फ एक बार होगी। और हारों को तोलना भी जरूरी है। अब आपको बताना यह है कि किस तरह से मात्र एक बार तोलकर चोर को पकड़ा जा सकता है।

तो शुरू हो जाए अपने दिमाग के घोडों को दौडऩे के लिए।

हमें इंतजार रहेगा आपके जवाबों का ।

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मंगलवार, जून 23, 2009

अग्नि वर्षा का देते थे झांसा-ग्रामीणों ने पहरा देकर फांसा

शैतानी शक्ति का खौफ दिखाकर ग्रामीणों को ठगने की योजना बनाई थी 13 साल के संतोष साहू ने छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले का एक गांव जहां पर रोज रात को पैरावट में आग लग रही है और सारे ग्रामीण परेशान हैं। आखिर ये क्या हो रहा है? पिछले दो माह से ऐसा कोई दिन खाली नहीं जा रहा है जब ऐसा नहीं हो रहा है। एक तरफ पैरावट में आग लग रही है तो दूसरी तरफ गांव के कुत्तों की मौत पर मौत हो रही है। ग्रामीण परेशान हैं और उनको लग रहा है कि किसी शैतानी शक्ति का साया गांव पर पड़ गया है। ऐसे में एक नहीं कई तांत्रिकों का सहारा लिया जाता है, इसी के साथ वैज्ञानिकों और प्रोफेसरों का दल भी गांव का दौरा करता है, पर हरकतें बंद नहीं होती हैं। सांसद से साथ पुलिस से भी मदद की गुहार लगाई जाती है, पुलिस के पहरे के बाद भी कुछ नहीं हो पाता है। ऐसे में एक पत्रकार इस घटना की सच्चाई जानने गांव जाता है और सारी घटना को समझने के बाद उस पत्रकार को संदेह होता है कि इस घटना के पीछे दो नाबालिग बच्चों का हाथ है और वह अपना यही संदेह अपने अखबार में जता देता है। इस खबर के बाद ग्रामीण सचेत होते हैं और रात को चुप-चाप पहरा दिया जाता है। पहरे का लाभ मिलता है और राकेट के बहाने अग्नि वर्षा होने की बात गांव भर में फैलाने वाला 13 साल का संतोष साहू अपने साथी 14 साल के जितेन्द्र साहू के साथ पकड़ा जाता है। इसके बाद राज खुलता है कि यह महज 13 साल का बच्चा इतना शातिर है कि गांव वालों को शैतानी शक्ति का डर दिखाकर लाखों रुपए कमाने की जुगत में था। संतोष अपने को बहुत बड़ा तांत्रिक साबित करना चाहता था।


छत्तीसगढ़ के गांवों में तंत्र-मंत्र का ज्यादा बोलबाला है और भोले-भाले ग्रामीण शैतानी शक्तियों से बहुत ज्यादा खौफ खाते हैं। गांव का रिश्ता टोनही और न जाने किस-किस तरह की शैतानी शक्तियों से होता है। अब शैतानी शक्तियां होती हैं या नहीं होती है, यहां पर वह मुद्दा नहीं है। यहां पर बात हो रही है कि किस तरह से एक गांव में महज 13 साल का एक शातिर बच्चा संतोष साहू गांव वालों में शैतानी शक्ति की दहशत पैदा करके लाखों रुपए कमाना चाहता था। धमतरी जिले के ग्राम अरौद में संतोष ने ऐसी दहशत फैला रखी थी कि सारे ग्रामीण परेशान थे। संतोष ने तंत्र-मंत्र से लाखों रुपए कमाने की योजना बनाई और इस योजना में एक और लड़के जितेन्द्र और उसके पिता बंसत साहू को शामिल कर लिया। इसके बाद प्रारंभ हुआ राकेट से अग्नि वर्षा का खेल। संतोष के साथ बंसत रोज सुबह को गांव भर में यह ढिढ़ोरा पिट देते थे कि आज पैरावट में आग लगने वाली है। संतोष यह भी बताता था कि आज कितने पैरावट में आग लगेगी। वह अगर कहता था कि पांच पैरावट में आग लगेगी तो उतने में ही आग लगती थी। वह जिस दिशा के पैरावट के बारे में बताता था, उसी दिशा में आग लगती थी। योजना के मुताबिक वह जितने पैरावट और जिस दिशा के पैरावट की बात करता था उनमें रात को आग लगाने का काम जितेन्द्र करता था। आग लगाने का काम फटाकों वाले एक अलग किस्म के राकेट से किया जाता था ताकि ग्रामीणों को लगे कि आसमान से आग बरस रही है जिसके कारण पैरावट में आग लग रही है। जितेन्द्र ही आग लगाने के बाद गांव में हल्ला करता था कि आग लग गई। इसी के साथ वह यह भी बताता था कि आसमान से जलता हुआ राकेट गिरा जिससे आग लगी है।
गांव में यह घटनाक्रम प्रारंभ हुआ तो पूरा गांव वाले परेशान हो गए। इस आफत से मुक्ति के लिए सबसे पहले संतोष साहू ने ही ग्रामीण से कहा कि वह इससे मुक्ति दिला सकता है, पर इसके लिए पांच लाख रुपए खर्च करने पड़ेंगे। पर ग्रामीण इतनी बड़ी रकम खर्च नहीं करना चाहते थे। ऐसे में ग्रामीणों ने कई तांत्रिकों और ओझाओं का सहारा लिया पर किसी भी तांत्रिक या ओझा को यह बात समझ ही नहीं आई कि आखिर ये सब कैसे हो रहा है। अगर वास्तव में किसी शैतानी शक्ति की करतूत होती तो कुछ पता चलता, पर यह तो सब इंसानी दिमाग की खुरापात थी।
ऐसे में सांसद चंदुलाल साहू के साथ कुछ वैज्ञानिकों और प्रोफेसरों का भी सहारा लिया गया। पर बात नहीं बनी किसी की समझ में यह बात आ ही नहीं रही थी कि आखिर ये घटनाएं कैसे हो रही हैं। पुलिस और जिलाधीश से शिकायत के बाद दिन-रात गश्त भी की गई, पर कोई फायदा नहीं हुआ। गांव वालों ने गायत्री यज्ञ भी किया, पर नतीजा वहीं शून्य रहा। गांव वाले इससे और ज्यादा दहशत में आ गए कि आखिर वे करें तो क्या करें। इधर संतोष साहू ने फिर से एक बार गांव वालों से कहा कि वह इस सारी घटना से मुक्ति दिला सकता है इसके लिए पांच लाख का खर्च आएगा। संतोष साहू ने गांव वालों को शैतानी शक्ति का यकीन दिलाने के लिए गांव के 22 कुत्तों को जहर देकर मार डाला था। कुत्तों को मारने के दो कारण थे, एक तो यह कि जब भी जितेन्द्र पैरावट में आग लगाने जाता था तो कुत्ते भोंकते थे। ऐसे में उनको पकड़े जाने का खतरा था, दूसरे कुत्तों को मारकर वे लोग गांव वालों को यकीन दिलाना चाहते थे कि यह सब शैतानी शक्ति का काम है। संतोष साहू और जितेन्द्र साहू इतने ज्यादा शातिर थे कि वे भी शैतानी शक्ति का रहस्य जानने वाले उन ग्रामीण के साथ रहते थे जो रात को पहरा देते थे। वे सबकी नजरें बचाकर पैरावट में आग लगा देते थे। ऐसे में उन पर कोई संदेह ही नहीं करता था।

जब गांव वालों को कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था ऐसे में एक धमतरी के पत्रकार ने गांव का दौरा किया और सारे हालात को जानने के बाद उनको संदेह हुआ कि इस घटना के पीछे संतोष साहू का हाथ हो सकता है। हालांकि उसकी उम्र को देखते हुए ऐसा लग नहीं रहा था, पर पत्रकार ने अपनी खबर में यह संदेह जता दिया। तब हर तरफ से निराश हो चुके ग्रामीणों ने इस दिशा में भी सोचते हुए रात को चुप-चाप पहरा देने का विचार किया और जैसे ही रात को चुप-चाप पहरा दिया गया तो पैरावट में आग लगाने वाला जितेन्द्र पकड़ में आ गया और इसी के साथ यह बात भी सामने आ गई कि इस सारे शैतानी खेल के पीछे महज 13 साल के संतोष साहू का दिमाग काम कर रहा था। संतोष ने पैसों का लालच देकर जितेन्द्र और उसके पिता बंसत साहू को भी अपने साथ मिला लिया था। संतोष की, की गई भविष्यवाणी को बंसत ही गांव भर में फैलाने का काम करता था। इन तीनों को पुलिस के हवाले कर दिया गया है। इस तरह से एक पत्रकार की सुझबुझ के कारण एक अनदेशी शैतानी शक्ति का खुलासा हुआ तो मालूम हुआ कि यह शैतानी शक्ति नहीं बल्कि इंसानी शक्ति है जो शैतानी शक्ति का रूप लेकर ग्रामीणों को डराकर ठगने का काम करने वाली थी।
(फोटो देशबन्धु में प्रकाशित खबर से मोबाइल द्वारा खींची गई है, साभार देशबन्धु)

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सोमवार, जून 22, 2009

टीम की सबसे लंबी खिलाड़ी छत्तीसगढ़ की

छत्तीसगढ़ की 6 फुट दो इंच लंबे कद की नेहा बजाज का चयन भारतीय नेटबॉल टीम में किया गया है। यह खिलाड़ी भारतीय टीम के साथ एशियन चैंपियनशिप में खेलने के लिए मलेशिया गई है। कामनवेल्थ के चल रहे प्रशिक्षण शिविर में भी नेहा शामिल है। कामनवेल्थ चैंपियनशिप अगले साल भारत में ही होने वाली है। नेहा इस समय भारतीय टीम की खिलाडिय़ों में सबसे लंबी खिलाड़ी है। नेहा छत्तीसगढ़ की ऐसी पांचवीं खिलाड़ी हैं जो भारतीय टीम से खेल रही हैं। इसके पहले बलविंदर कौर आनंद, मनमीत कौर, प्रीति बंछोर, और कंच सहस्त्रबुद्धे खेल चुकी हैं।

जब भारत की नेटबॉल टीम बनती है तो उसमें छत्तीसगढ़ की किसी ने किसी खिलाड़ी को स्थान जरूर मिलता है। इस समय जबकि भारत की टीम मलेशिया में ७वीं एशियन नेटबॉल चैंपियनशिप में खेलने गई तो इस टीम की सबसे लंबी खिलाड़ी नेहा बजाज छत्तीसगढ़ की हैं। वहां पर यह चैंपियनशिप २८ जून तक होगी। इस चैंपियनशिप के लिए चुनी गई भारतीय टीम में नेहा बजाज को भी रखा गया है। नेहा कामनवेल्थ चैंपियनशिप के लिए चल रहे भारतीय टीम के प्रशिक्षण शिविर में पिछले एक माह से प्रशिक्षण भी ले रही हैं। नेहा ने इसके पहले श्रीलंका में खेली गई तीन देशों की चैंपियनशिप के साथ हांगकांग में खेली गई यूथ चैंपियनशिप में भी भारतीय टीम का प्रतिनिधित्व किया था। भारतीय टीम ने मलेशिया जाने से पहले सिंगापुर में एक सप्ताह रूककर वहां की टीम के साथ अभ्यास मैच खेले। नेहा से पहले छत्तीसगढ़ की चार और खिलाड़ी भारतीय टीम से खेल चुकी हैं। नेहा के साथ छत्तीसगढ़ की कुछ और खिलाडिय़ों को कामनवेल्थ की टीम में स्थान मिलने की उम्मीद है।

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नहीं जाएगी बाढ़ में जान-ट्रेंड होंगे जवान


छत्तीसगढ़ में वैसे तो बाढ़ की स्थिति बहुत कम रहती है लेकिन इसके बाद बाढ़ से किसी की जान न जाए इस मामले में सरकार गंभीर लगती है। यही वजह है कि आज मानसून के पहले ही सावधानीवश बाढ़ के कारण जाने वाली जानों को बचाने का सामान कर लिया गया है। यानी की अब बाढ़ से किसी की जान नहीं जाएगी क्योंकि प्रदेश सरकार की पहल पर होम गार्ड विभाग ने एक दर्जन बोट खरीद ली है और अब सभी जिलों के होम गार्ड को प्रशिक्षण दिलाने के लिए कोलकाता से विशेषज्ञों के एक दल को बुलाया जा रहा है। यह दल एक सप्ताह तक होम गार्ड को ट्रेंड करने का काम करेगा।

प्रदेश में मानसून आने से पहले ही इस बार बाढ़ से निपटने की तैयारी कर ली गई है। पिछले कुछ सालों से प्रदेश के कुछ जिलों बस्तर, जांजगीर चांपा, रायगढ़, राजनांदगांव के साथ रायपुर जिले के आरंग और गरियाबंद में बाढ़ की स्थिति बनी है। यहां पर जाकर होम गार्ड के जवानों के कई लोगों की जान भी बचाई है। बाढ़ की स्थिति में बोट न होने के कारण जान-माल की हिफाजत करने में आ रही परेशानी को देखते हुए ही आपदा कोष से १८ बोट लेने का फैसला किया गया था, पर पैसों की कमी को देखते हुए फिलहाल १२ बोट ली गई है। एक-एक बोट चार लाख पचास रुपए की है।


होमगार्ड के रायपुर जिले के प्रभारी एनके चावरे ने बताया कि बोट की बहुत ज्यादा बहुत जरूरत थी। इसके बिना बाढ़ की स्थिति में बहुत परेशानी का सामना करना पड़ता था। उन्होंने बताया कि कोलकाता की कंपनी से एक विशेषज्ञों का दल यहां आने वाला है। इस दल के आने पर हर जिले के कुछ चुने हुए होम गार्ड को बुलाकार उनको प्रशिक्षण दिया जाएगा। यह प्रशिक्षण ८ दिनों का होगा। कोलकाता कंपनी के निदेशक संतोष शाह ने बताया कि उनकी कंपनी का जो विशेषज्ञों का दल आएगा वह न सिर्फ बोट के बारे में जानकारी देगा, बल्कि यह भी बताएगा कि बाढ़ की स्थिति में लोगों की जान कैसे बचानी है। उन्होंने बोट के बारे में बताया कि रबर की यह बोट पांच हिस्सों में बांटी गई है ताकि एक हिस्से की हवा निकलने पर बाकी हिस्से काम कर सके। उन्होंने बताया कि एक बोट को ४० मिनट के अंदर ही हवा भर कर तैयार किया जा सकता है। पूछने पर उन्होंने बताया कि उनकी कंपनी ने छत्तीसगढ़ में बोट देने से पहले कुछ और राज्यों में बोट दी है। उन्होंने बताया बोट में१० लोगों के बैठने की क्षमता है।


सतनाम के बचाई है १०० जानें


बोट चलाने का प्रशिक्षण लेने वालों में शामिल होम गार्ड सतनाम सिंह ने बताया कि यहां तो हम महज बोट चलाने का प्रशिक्षण दे रहे हैं। उन्होंने बताया कि वैसे उनको पांच साल से बोट चलाने का अनुभव है और वे भी दूसरे गार्ड को इसके बारे में बता रहे हैं। उन्होंने बताया कि वे अब तक बाढ़ में करीब १०० लोगों की जानें बचा चुके हैं। उन्होंने बताया कि पिछले सालों में उन्होंने सिलतरा में जहां ४० जानें बचाई थी, वहीं आरंग एक गांव में आइ बाढ़ में भी उन्होंने कई जानें बचाई हैं। उनका कहना है कि बाढ़ में जाकर लोगों की जान बचाने में जो सुख मिलता है, वैसा सुख और कहीं नहीं मिल सकता है।

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रविवार, जून 21, 2009

ये कैसी मां...

मां को तो ममता की मूर्ति और न जाने क्या-क्या कहा जाता है। मां से बढ़कर इस दुनिया में और कोई नहीं होता है। एक तरफ जहां दुनिया में अच्छी मांओं की कमी नहीं है, वहीं कुछ मांएं ऐसी भी होती हैं जो अपने ही बच्चे का गला घोट देती हैं। ऐसी मांएं ज्यादातर वो होती हैं जो बच्चों को जायज नहीं बल्कि नाजायज तरीके से जन्म देती हैं और समाज के डर से उनका गला घोट कर फेंक देती हैं किसी कचरे के डिब्बे में। ऐसी की किसी निर्दयी मां ने अपने नवजात को रायपुर के पुजारी पार्क की एक नाली में फेंकने का काम किया। इसकी खबर लगने पर वहां से पुलिस से उस नवजात का शव बरामद किया है। पुलिस अब यह पता लगाने में लगी है कि उस नवजात को किसने जन्म देकर फेंकने का काम किया है। वैसे इस तरह की घटनाएं देश में कहीं भी होती रहती हैं।

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अश्लीलता पर सरकारी फंदा

सायबर कैफे ज्यादातर इसलिए बदनाम हैं कि वहां पर जाकर आज के युवा इंटरनेट पर ज्ञान की बातें जानने का काम कम और अश्लील साइट देखने का काम ज्यादा करते हैं। यही नहीं कई साइबर कैफे तो प्रेमी युगल को मिलने का स्थान देने का काम करते हैं। सायबर कैफे में प्रेमी युगलों की कई आपत्तिजनक तस्वीरें खींच कर उनको ब्लैकमेल करने का काम भी कई सायबर कैफे करते रहे हैं। कुल मिलाकर सायबर कैफे को अश्लीलता फैलाने के नाम से ज्यादा जाना जाता है। पर अब यह सब काम सायबर कैफे में नहीं हो सकेगा क्योंकि अश्लीलता फैलाने वाले ऐसे सायबर कैफे पर शिकंजा कसने का काम छत्तीसगढ़ सरकार ने किया है और ऐसे कड़े नियम बना दिए हैं कि अब कोई भी कम से कम सायबर कैफे में ऐसे किसी साइट को नहीं खोल पाएगा जिस साइट में अश्लीलता होती है। इसी के साथ सायबर कैफे में होने वाले दूसरे अपराधों पर भी रोक लगेगी। छत्तीसगढ़ सरकार से पूरे प्रदेश में सायबर कानून लागू कर दिया है। इस कानून के कारण अब यह लगता है कि गलत तरीके से सायबर कैफे से कमाई कराने वालों की सामत आनी तय है। अभी से कई सायबर कैफे बंद होने की तैयारी में हैं।

सायबर कैफे का उपयोग करने वाले ज्यादातर स्कूल-कॉलेज के ऐसे किशोर और युवा हैं जो अपने-स्कूल कॉलेज से गोल मारकर यहां जाते हैं और सायबर कैफे में बैठकर उन गंदी साइट्स को देखने का काम करते हैं जो साइट्स अश्लीलता परोसने का काम करते हैं। इसी के साथ सायबर कैफे में ज्यादातर कैफे केबिन भी उपलब्ध कराते हैं। ये केबिन महज 20 से 25 रुपए घंटे के किराए में उपलब्ध हो जाते हैं। ऐसे में इन केबिन का उपयोग ऐसे प्रेमी युगल ज्यादा करते हैं जिनके पास मिलने के लिए कोई ठिकाना नहीं रहता है। इतना सस्ता ठिकाने उनको और कहां मिल सकता है। ठिकाने के साथ इंटरनेट पर मनचाही साइट देखने का भी मजा। जब कोई प्रेमी युगल सायबर कैफे में बैठकर साइट्स के साथ दुगना मजा लेने में मस्त रहते हैं तो उनकी वीडियो फिल्म बनाने का काम करने में सायबर कैफे वाले मस्त रहते हैं। इसके बाद प्रारंभ होता है उनको ब्लैकमेल करने का सिलसिला। चूंकि प्रेमी युगल गलत रहते हैं इसलिए उनको ब्लैकमेलरों की हर जायज और नाजायज बात माननी पड़ती है। यहां पर सबसे ज्यादा परेशानी लड़कियों को होती हैं। उनके साथ न जाने क्या-क्या घटता है। सायबर कैफे में बैठकर अश्लील साइड देखने वाले नाबालिगों की भी कमी नहीं है। स्कूल के कई नाबालिग लड़के और लड़कियां इन सायबर कैफे के केबिनों में देखे जा सकते हैं। जिन भी कैफे में ऐसे किशोर या युवा जाते हैं उन कैफे के सर्वे से यह बातें एक बार नहीं कई बार सामने आई हैं कि उन कैफे में ये किशोर और युवा किसी शिक्षा की जानकारी लेने नहीं बल्कि अश्लील साइट देखने ही जाते हैं। वैसे भी सायबर कैफे वालों को अपने पैसों से मतलब रहता है उनको इस बात से कोई सरोकार नहीं रहता है कि उनका ग्राहक क्या कर रहा है। संभवत: यही वजह भी रही है कि सायबर कैफे से ही कई तरह के अपराध होते हैं।

सायबर कैफे से ही से जहां अश्लील चैटिंग भी होती है, वहीं यही से हैकिंग भी होती है। वैसे छत्तीसगढ़ में किसी बड़ी हैकिंग की खबर अब तक नहीं आई है। लेकिन हैकिंग होती तो है। सायबर कैफे से होने वाले अपराधों के कारण सरकार ने अंत: में परेशान होकर अब एक कानून बना दिया है जिसके कारण यह तय हो गया है कि अब कोई भी सायबर कैफे अश्लीलता फैलाने का काम नहीं कर पाएगा। इसी के साथ किसी भी सायबर कैफे में अपराध नहीं हो सकेंगे। इस कानून के मुताबिक अब तो सायबर कैफे में बिना पहचान बताए कोई प्रवेश भी नहीं कर पाएगा। पहचान बताने के लिए अपना आईडी प्रूफ देना पड़ेगा। अपराध करने वाले अपनी सही पहचान नहीं बताएंगे। हो सकता है कि कोई गलत पहचान बताकर सायबर कैफे में प्रवेश कर जाए। लेकिन इसके बाद भी उसका वहां पर किसी भी तरह की आपराधिक गतिविधियों को अंजाम देना संभव नहीं होगा। सायबर कैफे से जहां केबिन की सुविधा हटा दी गई है, वहीं यह तय किया गया है कि सभी कम्प्यूटर की स्क्रीन ऐसी होगी जो बाहर से नजर आएंगी, ताकि यह देखा जा सके कि कोई भी ग्राहक क्या उपयोग कर रहा है। कैफे में ग्राहकों के लिए एक रजिस्टार रखना होगा जिसमें पूरी जानकारी देनी होगी। इसी के साथ हर माह कैफे वालों को थाने में मासिक रिपोर्ट देनी होगी। इसी के साथ किसी भी कैफे में कभी भी पुलिस छापा मार देगी। कुल मिलाकर नियमों को इतना कड़ा बना दिया गया है कि यह बात तय है कि सायबर कैफे की आड़ में चलने वाला अश्लीलता का धंधा बंद ही हो जाएगा। ऐसा धंधा करने वाले तो कई सायबर कैफे अभी से बंद होने लगे हैं।


चलो छत्तीसगढ़ सरकार ने एक काम तो अच्छा किया है। अब दूसरे राज्यों में सायबर कानून की क्या स्थिति है इसकी जानकारी तो हमें नहीं है। हमारे ब्लागर मित्रों से आग्रह है कि वे अपने राज्यों के बारे में हो सके तो जानकारी देने की कृपा करें।

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शनिवार, जून 20, 2009

लव ने मिला दी जोड़ी


कुछ समय पहले एक फिल्म आई थी रब ने बना दी जोड़ी। इस फिल्म को मिली सफलता ने ही छोटे पर्दे में धारावाहिक बनाने वालों को एक विषय दिया और अब छोटे पर्दे के लिए एक नया धारावाहिक लव ने मिला दी जोड़ी तैयार किया गया। अब इस धारावाहिक का प्रसारण होने वाला है। यह धारावाहिक छोटे शहर के तीन उत्साही नवयुवक तीन खूबसूरत लड़कियां और उनके बीच प्यार का एक धागा। स्टार वन जिसने समकालीन और जवां कार्यक्रम प्रस्तुत करने में अपनी अलग मिसाल कायम कर रखी है, अपने दर्शकों के लिए युवा प्रेमियों की एक दिलचस्प कहानी का प्रसारण प्रारंभ करने करने जा रहा है। स्टार वन पर 22 जून से प्रसारित होने वाले इस नये कार्यक्रम का नाम है लव ने मिला दी जोड़ी। यह कहानी है तीन जवां प्रेमियों की जिसमें उनकी जिंदगी, प्यार, टकराव, चुनौतियों और उनके नसीब का चित्रण किया गया है।



यह कार्यक्रम तीन युवा दृढ़ प्रतिज्ञ भाईयों की जिंदगी की बयां करेगा, जो एक खास उद्देश्य के साथ मुंबई आए है परंतु भाग्य करवट लेता है और उनकी योजनाएं उस समय बदल जाती है जब उनका सामना तीन खूबसूरत लड़कियों से होता है। उनका प्यार असामान्य परिस्थितियों में भी परवान चढऩे लगता है। कार्यक्रम में तीन जोडिय़ों के प्यार, मस्ती और रोमांस की कहानी दिखाई गई है जिसके मुख्य किरदार पृथ्वी (गौरव खन्ना), दामिनी (चंदना शर्मा), वरूण (दीक्षांत अरोड़ा), रोशनी (सिमरन कौर), समीर (करण ठाकर) और अवनि (परणीत चौहान)। लव ने बना दी जोड़ी एक समकालीन प्रेम कहानी से भी कहीं अधिक है। इस कहानी का ताना-बाना बुनते समय इसमें षडय़ंत्र, बदला और मानवीय भावनाओं जैसे प्यार, घृणा, कर्तव्य को ध्यान में रखा गया है। दर्शक यह देख सकेंगे कि जब ये भावनाएं आपस में टकराएंगी तो क्या होता है। शो के मुख्य किरदारों पर इसका क्या और किस तरह से प्रभाव पड़ता है। यह पेशकश अनोखी व खोजपरक है, इसका प्रोडक्शन वैल्यू उच्च श्रेणी का है और सेट की डिजाइनिंग भी सुरुचिपूर्ण तरीके से की गई है। इस शो अभिनय करने वाले नौजवान कलाकार युवा भारतीयों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस धारावाहिक का प्रसारण सोमवार से शुक्रवार तक रात्रि 9.30 बजे तक किया जाएगा।

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मासूम बहन को भी नहीं छोड़ा बलात्कारी चचेरे भाईयों ने

बलात्कार करने वाले कितने बड़े दरिंदे होते हैं इसके कई उदाहरण मिलते रहते हैं। ऐसा ही एक भयानक उदाहरण उत्तर प्रदेश में सामने आया है जब चचेरे भाईयों के पास एक बहन को गिरवी के तौर पर रखा गया तो उन्होंने उस 11 साल की मासूम के साथ एक बार नहीं बल्कि लगातार दो माह तक बलात्कार किया। इस घटना के लिए सबसे बड़े जिम्मेदार समाज के वो ठेकेदार हैं जिनके फरमान के कारण उस मासूम को चचेरे भाईयों के पास गिरवी रखा गया था।

उत्तर प्रदेश के फैजाबाद जिले के खंडासा गांव में नट जाति का एक लड़का अपने ही समाज की लड़की से प्यार करता था। इनका प्यार दोनों के परिजनों को मंजूर नहीं था, ऐसे में इस प्रेमी युगल ने भागकर शादी करने का फैसला किया और दोनों गांव छोड़कर भाग गए। इस मामले की जानकारी होने पर गांव में लड़की के परिजनों की शिकायत पर पंचायत बुलाई गई। पंचायत ने लड़के के पिता पर जहां 50 हजार रुपए जुर्माना ठोंक दिया, वहीं यह भी फरमान जारी किया कि जब तक लड़का लड़की को लेकर वापस नहीं आता है, लड़के की 11 साल की बहन को उसके चाचा के घर पर गिरवी के तौर पर रखा जाए। पंचायत ने संभवत: यह फैसला इसलिए किया था क्योंकि उसको ऐसा लगा कि लड़की का मामला है ऐसे में लड़की को अपने चाचा के घर पर रखने में परेशानी नहीं होगी। लेकिन पंचायत के इस फैसले का मासूम लड़की के चचेरे भाईयों ने गलत फायदा उठाया और लड़की को अंजान स्थान पर ले गए और उसके साथ लगातार दो माह तक बलात्कार करते रहे। इधर भागे प्रेमी युगल के वापस आने के बाद भी पंचायत का फरमान जारी रहा। ऐसे में जब लड़के के पिता ने मामला पुलिस में दर्ज करवाया तब यह बात सामने आई कि लड़की को जिस चाचा के घर पर बतौर गिरवी रखा गया था, वहां से उसको दूसरे स्थान पर ले जाकर चचेरे भाई बलात्कार करते रहे। पुलिस ने इस मामले में बलात्कार के साथ अपरहरण का मामला दर्ज कर लिया है। लड़की के बयान पर चार लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार भी किया है। इस मामले से जुड़े पंचायत के सदस्य फरार हो गए हैं।

इस मामले में देखा जाए तो गलती उन समाज के ठेकेदारों की है जो एक प्रेमी युगल को शादी करने की इजाजत नहीं देते हैं। मामला अलग-अलग समाज का होता तो एक बार बात समझ में आती लेकिन एक ही समाज के लड़के और लड़की को शादी की इजाजत देने में क्या परेशानी ? एक तो शादी की इजाजत नहीं दी गई और लड़के और लड़की ने भागकर शादी कर ली तो इधर पंचायत ने एक ऐसा फरमान जारी किया जिसके कारण एक 11 साल की मासूम की जिंदगी ही उजड़ गई। ऐसी और न जाने कितनी घटनाएं होती हैं जो सामने नहीं आ पाती हैं। समाज की गलत परम्पराओं की सूली पर हमेशा महिला की ही बलि ली जाती है। इस घटना ने भी एक बार फिर से यह बात साबित कर दी है कि आज की नारी सबसे ज्यादा असुरक्षित अपने घर-परिवार में ही है।

पति के सामने ही गैंग रेप

मप्र की राजधानी भोपाल की एक घटना सामने आई है कि एक महिला के साथ उसके पति के सामने ही कार में चार युवकों ने गैंग रेप किया। इस दंपति ने रात में इस कार से लिफ्ट मांगी थी। दंपति को कार में लिफ्ट देने के बाद कार में सवार चार युवकों ने महिला के पति पर रिवाल्वर टिका दी और महिला के साथ चलती कार में ही बलात्कार करते रहे। यहां पर सोचने वाली बात है कि उस पीडि़त दंपति को भी सावधानी बरतनी थी। किसी भी अंजान युवकों से रात के समय में लिफ्ट मांगना वैसे भी खतरनाक होता है। ऐसे में उस दंपति को कोई दूसरा साधन देखना था। ऐसा नहीं है कि लोगों को मालूम नहीं है। आज हर अखबार में कहीं न कहीं ऐसी घटनाओं की खबरें छपती रहती हैं। रोज एक नहीं कई महिलाएं और मासूम बच्चियां बलात्कार की शिकार हो रही हैं। ऐसे में और जरूरी हो जाता है कि सावधानी बरती जाए। थोड़ी सी चूक का नतीजा क्या होता है, यह बताने की जरूरत नहीं है। आज लगता है कि समाज का पूरी तरह से पतन हो गया है। यह सबके लिए चिंतन का विषय है कि आखिर बलात्कार जैसे घिनौने अपराध से देश और समाज को कैसे बचाया जाए।

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शुक्रवार, जून 19, 2009

बिन पानी सब सून...

पानी की जरूरत किसे नहीं होती है। छत्तीसगढ़ अब तक गर्मी की चपेट में है और यहां कई गांवों में आज भी पानी की मारा-मारी है। एक गांव में काफी दूर से अपने लिए पानी लेकर घर जाती एक महिला की तस्वीर यही बयान कर रही है कि पानी बिन सब सून..

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बलात्कार तो शाइनी का हुआ !

शाइनी आहूजा एक सीधा साधा, भोला-भाला इंसान है। वह इंसान किसी का दिल भी नहीं दुखा सकता है। शाइनी ने कभी ऐसा कोई काम नहीं किया है जिसके कारण किसी को परेशानी हो, फिर वह बलात्कार कैसे कर सकते हैं। उनको सरासर फंसाने का काम किया जा रहा है। अरे.... अरे... मित्रों आप नाराज क्यों हो रहे हैं, यह हम नहीं कह रहे हैं और हम कभी ऐसे इंसान की वकालत भी नहीं कर सकते हैं जिनके ऊपर बलात्कार का आरोप लगा हो। यह सब तो शाइनी की महान पत्नी कह रही हैं। एक तरह से अनुपमा का दावा है कि शाइनी ने बलात्कार नहीं किया है बल्कि उनका ही बलात्कार हुआ है। अनुपमा ने यह बात सीधे तौर पर नहीं कही है लेकिन उन्होंने जिस तरह से यह कहा है कि महिलाएं भी रेप कर सकती हैं, उसका सीधा सा मतलब तो यही है कि एक 16 साल की नाबालिग ने उनके पति का रेप कर दिया है। जो लड़की शाइनी का शिकार बनी है उसके नाबालिग होने की बात की जा रही है और वह लड़की छत्तीसगढ़ की एक आदिवासी लड़की है जिसका संबंध जशपुर जिले के गांव डुमाटोली से है। इधर एक पत्रकार महोदय भी शाइनी के पक्ष में सामने आकर उन पर लगे आरोप को गलत साबित करने में तुले हैं।

किसी भी पत्नी का अपने पति के ऊपर भरोसा करना बहुत अच्छी बात है, लेकिन जरूरत से ज्यादा भरोसा घातक होता है। पहले हमेशा किसी भी सच्चाई को गंभीरता से जानना चाहिए उसके बाद कोई फैसला करना चाहिए। लेकिन शाइनी आहूजा की पत्नी को तो लगता है पति धर्म निभाने का भूत चढ़ा हुआ है। भूत भी ऐसा कि उसको कोई भी उतार नहीं सकता है। जब से शाइनी पर अपनी नौकरानी से बलात्कार करने का आरोप लगा है अनुपमा आहूजा लगातार एक ही बात रट रही हैं कि उनके पति ऐसा नहीं कर सकते हैं। उनकी यहां तक की बात तो ठीक थी कि चलो कोई भी पत्नी नहीं चाहती है कि उनके पति पर ऐसा आरोप लगा हो और वह उस पर भरोसा न जताए। लेकिन अब तो अनुपमा के बयान से अति ही हो गई है। अनुपमा का सीधे तौर पर ऐसा मानना है कि बलात्कार शाइनी ने नहीं किया है बल्कि उनका बलात्कार हुआ है।

यह बात भले उन्होंने सीधे तौर पर नहीं कही है, पर जिस तरह से उन्होंने सीधे नारी जाति पर तोहमत लगाने का काम किया है कि महिलाएं भी बलात्कार कर सकती हैं, उससे उनके कहने का मतलब यही है कि शाइनी का बलात्कार हुआ है। अब सोचने वाली बात यह है कि शाइनी का एक 16 साल की लड़की कैसे बलात्कार कर सकती है। एक बार यह कहा जाता कि शाइनी को फंसाया गया और लड़की ने उनको शारीरिक संबंध बनाने के लिए खुद उकसाया था तो बात हजम भी हो जाती। वैसे मुंबई के एक पत्रकार महोदय जरूर इसी लाइन पर काम कर रहे हैं और यह साबित करने की जुगत में है कि शाइनी को फंसाया गया है और लड़की के उकसाने पर ही शाइनी ने उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए थे। ये पत्रकार महोदय शाइनी के घर के आस-पास के लोगों से मिलकर जासूसी का काम कर रहे हैं। इनकी जासूसी से ही यह बात सामने आई है कि लड़की का एक बॉय फ्रेंड है जिसकी आदतें ठीक नहीं हैं। मुबंई की भाषा में कहा जाए तो वह मवाली है। ऐसे में इस बात की संभावना है कि लड़की ने उसके कहने पर पैसों के चक्कर में शाइनी को फंसाया होगा। अब असली मामला चाहे जो होगा वह तो सामने आ ही जाएगा।


बहरहाल यहां पर सवाल है कि अनुपमा ने अपने पति को बचाने के लिए जो बयान दिया है उसे महिला मंडली किस रूप में लेती है। वैसे इस बात को जरूर माना जा सकता है कि महिलाएं बलात्कार कर सकती हैं। ऐसे कुछ मामले हुए भी हैं, लेकिन कोई एक महिला किसी एक पुरुष का बलात्कार कर सकती है, ऐसा मामला कम से कम हमने तो नहीं सुना है। हां कुछ लड़कियों द्वारा एक लड़के के साथ बलात्कार के दो मामले काफी पहले तब हमारी नजरों में आए थे जब हम लॉ कॉलेज में पढ़ते थे। उस समय एक तो जलगांव में और एक मामला भिलाई में हुआ था कि कुछ लड़कियों ने अपने घर में एक लड़के को बुलाकर उसका गैंप रेप किया था। ऐसे में हमने भी अपने कॉलेज में प्रोफेसर से एक सवाल किया था कि अगर कोई महिला किसी पुरुष का रेप कर दे तो क्या सजा होती है। ऐसे में उनका जवाब था कि पुरुष को समाज में बलशाली माना जाता है ऐसे में संविधान में ऐसी कोई धारा नहीं है। अब यह बात तो गलत है कि पुरुष बलशाली है इसलिए कोई धारा नहीं है। अगर कुछ लड़कियां या फिर कुछ महिलाएं ऐसा कृत्य करती हैं तो उनके लिए भी धारा 376 का उपयोग होना चाहिए, पर ऐसा नहीं होता है।


बहरहाल इस समय बहस का मुद्दा यह नहीं है। इधर शाइनी की नौकरानी की बात की जाए तो वह ऐसा इसलिए नहीं कर सकती है क्योंकि वह लड़की नाबालिग है। भले उस लड़की को 20 साल की बताया जा रहा है, पर लड़की दरअसल में 16 साल की है और यह लड़की छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले की डुमाटोली गांव की है। यह लड़की यहां से महज चार माह पहले ही लापता हुई है। जशपुर क्षेत्र की कई आदिवासी लड़कियों को बहलाकर मुंबई ले जाया गया है काम दिलाने के नाम पर। वहां पर इन लड़कियों से जिस्मफरोशी का भी धंधा करवाया जाता है, ऐसी खबरें कई बार आई हैं। मुंबई की पुलिस लड़की की सही उम्र का पता लगाने के लिए छत्तीसगढ़ भी आई है और लड़की के मूल गांव भी गई है। अगर लड़की वास्तव में नाबालिग हुई तो फिर शाइनी का बचना मुश्किल हो जाएगा। फिर वे चाहे यह साबित भी कर दें कि लड़की की सहमति से उन्होंने उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए थे। ऐसे में लड़की के नाबालिग होने की वजह से उन पर बलात्कार का मामला बन ही जाएगा। अब मामला किस करवट बैठता है यह तो लड़की की सही उम्र सामने आने के बाद ही मालूम होगा। लेकिन फिलहाल तो शाइनी की पत्नी की जय हो...।

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गुरुवार, जून 18, 2009

हे भगवान उन्हें माफ कर देना...

अरे छोड़ों न यार मैं किसी भगवान-वगवान को नहीं मानता, ये सब फालतू की बातें हैं। न जाने लोग एक पत्थर की मूर्ति में क्या देखते हैं जो उसको पूजने लगते हैं। ऐसा कहने वाले नास्तिकों की इस दुनिया में कमी नहीं हैं। लेकिन इस दुनिया में ऐसे नास्तिक कम और आस्तिक ज्यादा हैं। इस दुनिया को चलाने वाली कोई न कोई शक्ति तो है जिसके कारण इस दुनिया का वजूद है। अब इस शक्ति को आप भगवान कहें अल्ला कहें, गॉड कहें या फिर चाहे आप जो नाम दे दें। लेकिन ऐसी कोई शक्ति है इस बात से इंकार तो नहीं किया जा सकता है। चंद लोगों के न मानने से क्या होगा। हम तो नास्तिकों के लिए यह दुआ करते हैं कि भगवान उनको अक्ल दें और वे आस्तिक बन जाएं। अगर ऐसे लोग आस्तिक नहीं बनते हैं तो हम तो बस यही कह सकते हैं कि हे भगवान उन्हें माफ कर देना। वैसे ईसु मसीह ने भी एक ऐसा ही वाक्य कहा था कि हे ईश्वर उन्हें माफ कर देना क्योंकि वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं। यही बात नास्तिकों पर भी लागू होती है। अब जबकि इस दुनिया में देवीय शक्ति है तो ऐसे में कहा जाता है कि शैतानी शक्ति भी है। यहां पर भी दो बातें हैं जिस तरह से लोग भगवान को नहीं मानते उसी तरह से शैतानी शक्ति को भी नहीं मानते हैं।

आज नास्तिक और आस्तिक की चर्चा यूं ही नहीं निकली है। अपने एक ब्लागर मित्र जाकिर अली रजनीश ने तस्लीम में एक लड़की लता के साथ हो रहे हादसों के उल्लेख के बाद उसमें हमने अपने एक टिप्पणी दी थी, कि इस दुनिया में जिस तरह से देवीय शक्ति है, उसी तरह से शैतानी शक्तियों से इंकार नहीं किया जा सकता है। इसी के साथ एक और साथी ब्लागर अनिल पुसदकर ने भी एक टिप्पणी में बताया था कि कैसे उनकी बहन की ठीक होली के दिन ही तबीयत खराब होती थी। इसका कारण उन्होंने एक इमली के पेड़ की टहनियों को काटकर होली जलाना बताया था। यह सिलसिला कई साल तक ठीक होली के दिन ही होता रहा। उन्होंने बताया था कि काफी इलाज के बाद जब वह ठीक नहीं हो सकीं तो एक झाड़ फूंक करने वाले संत का सहारा लिया गया था। हमारी और अनिल जी की इन टिप्पणियों के बाद एक ब्लागर मित्र प्रकाश गोविंद की लंबी चौड़ी टिप्पणी आई कि जिसका सीधा सा मतलब यह है कि हम जैसे लोग अंधविश्वास फैलाने का काम कर रहे हैं। हमारा मकसद किसी भी तरह का अंधविश्वास फैलाना नहीं है। अंधविश्वास को रोकना हम पत्रकारों का काम हमेशा से रहा है। लेकिन किसी के साथ होने वाली अजीब घटनाओं से कैसे इंकार किया जा सकता है। इस दुनिया में न जाने ऐसे कितने उदाहरण होंगे जिससे यह साबित हुआ है कि कहीं न कहीं कुछ है जिसके कारण इंसान को परेशानी होती है। ऐसी कोई शक्ति तो है जो इंसान के साथ गलत करती है। ऐसे में इंसान ठीक उसी तरह से जिस तरह से भगवान को मानता है किसी शैतानी शक्ति को भी मानने के लिए मजबूर हो जाता है। ऐसे में उस इंसान को इस दुनिया को बनाने वाले भगवान की शरण में जाना पड़ता है।

कहते हैं कि भगवान अपने चाहने वालों के संकट हरने के लिए इसी दुनिया में अपने बंदे को किसी न किसी रूप में भेजते हैं। तो ऐसे कई सच्चे साधु-संत हैं जो लोगों का कष्ट हरने का काम करते हैं। यहां पर भी दो बाते होती हैं जब अच्छे साधु-संत हैं तो बुरे भी हैं। ऐसे बुरे लोगों से जरूर सबको बचाने का काम करना चाहिए। जो इंसान परेशान होता है उसको किसी का भी सहारा मिल जाए तो वह अपने को धन्य समझता है। ऐसे में ही ठगी करने वाले लोग किसी भी इंसान की मजबूरी का फायदा उठाने का काम करते हैं। ऐसे ठगों से ही लोगों को बचाने का काम किया जाए तो वह सच्चा पुन्य है। ऐसे किसी काम में हम क्या कोई भी साथ देने को तैयार रहता है। हमें इस बात से इंकार नहीं है कि झाड़-फूंक और भूत-प्रेत भगाने के नाम पर ज्यादातर मामलों में लोग ठगे जाते हैं। इसका कारण यह है कि इस दुनिया में जहां सच्चे साधु-संतों की कमी है, वहीं इस बात को कोई नहीं जानता है कि जिनकी शरण में वे गए हैं वो सच्चे हैं या फिर ठग। जब इंसान परेशानियों से घिरा होता है तो उसको हर उस इंसान में भगवान नजर आता है जो उसकी किसी न किसी तरह से मदद करता है। अब ऐसे में किसी के साथ विश्वास का फायदा उठाकर कोई ठगता है को क्या किया जा सकता है।
हमारे मित्र गोविंद जी तो भगवान के अस्तित्व को भी नहीं मानते हैं। यह उनकी गलती नहीं है। ऐसे लोगों की इस दुनिया में कमी नहीं है जो भगवान को नहीं मानते हैं। लेकिन किसी के मानने न मानने से क्या होता है। जब कोई देवीय शक्ति को ही नहीं मानता है जिसके कारण आज सारे संसार का अस्तित्व है तो फिर यह अपने आप में स्पष्ट बात है कि वह शैतानी शक्ति को कैसे मान सकता है। दुनिया के वैज्ञानिकों ने काफी कोशिश की कि वे देख सकें कि आखिर इंसान के मरने के बाद उसकी आत्मा जाती कहां है, पर सफलता नहीं मिली। अगर सफलता मिल जाती तो उस न देखी हुई देवीय शक्ति को कौन मानता और वैज्ञानिक भगवान हो जाते। अगर किसी में दम है तो फिर इंसान की मौत को रोककर बताए, समय को रोक कर बताए, फिर कहे कि इस दुनिया में भगवान नाम की चीज नहीं होती है। क्या किसी ने आज तक हवा को देखा है, फिर क्यों मानते हैं कि हवा है। जिस तरह से वेद-पुराणों में देवताओं की बातें मिलती हैं, उसी तरह से राक्षसों की बातें भी हैं। हर चीज के दो पहलू होते ही हैं सिक्के का एक पहलू और ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती है। फिर ये कैसे संभव है कि दुनिया में जहां देवीय शक्ति हैं, वहां उसके विपरीत शैतानी शक्ति न हो। कोई माने न माने सच को बदला नहीं जा सकता है।

जिस तरह से लोग देवीय शक्ति को नहीं मानते हैं उसी तरह से शैतानी शक्ति को भी नहीं मानते हैं। मत मानो न यार किसने कहा है कि आप मानो, लेकिन किसी और को क्यों कहते हैं कि यह गलत है। यहां पर सवाल एक अनिल पुसदकर का या किसी लता का नहीं है। दुनिया में काफी कुछ ऐसा घटता है जिससे इंकार नहीं किया जा सकता है। कई बार ऐसा हुआ है कि जो लोग ऐसी बातें नहीं मानते हैं, उनके साथ हादसे हो जाते हैं। फिर उनको भी मानना पड़ता है कि कुछ तो है। अगर किसी के साथ होने वाले अजीब हादसे बीमारी हैं तो फिर ऐसी बीमारी का इलाज डॉक्टर क्यों नहीं कर पाते हैं? इसका जवाब किसके पास है। डॉक्टर एक लाइन में जवाब दे देते हैं कि समझ में नहीं आ रहा है कि क्या बीमारी है। जहां पर विज्ञान की सरदह का अंत होता है वहीं से प्रारंभ होता देवीय शक्ति का दरवाजा। इंसान सब तरफ से थक हार कर अंत में भगवान की शरण में ही जाता है। फिर कैसे आप भगवान के होने से इंकार कर सकते हैं। आप भले भगवान को न मानें लेकिन आपके ऐसा करने से इस दुनिया को बनाने वाले को कोई फर्क पडऩे वाला नहीं है। भगवान ने वैसे भी किसी को बाध्य नहीं किया है कि कोई उन्हे माने। यह तो अपनी-अपनी श्रद्धा का सवाल है। वैसे भी कहा जाता है कि मानो तो देवता न मानो तो पत्थर। हम कौन होते हैं किसी नास्तिक को आस्तिक बनाने वाले। लेकिन हम तो कम से कम भगवान को जरूर मानते हैं और मानते रहेंगे।

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बुधवार, जून 17, 2009

हर दूसरे घर में हैं बलात्कारी दरिंदे

अभी कुछ दिनों से लगातार अखबार और टीवी चैनलों की सुर्खियों में बलात्कार करने वाले एक हीरो की चर्चा है। चर्चा इसलिए ज्यादा है क्योंकि बलात्कार जैसा अपराध करने वाला यह बंदा एक फिल्म स्टार है। ऐसे में सुर्खियों का बनना लाजिमी है। अब यह बात अलग है कि शाइनी आहूजा ने बलात्कार किया है, या नहीं। यह तो बाद में मालूम होगा। लेकिन इसमें कोई दो मत नहीं है कि आज हर दूसरे घर में बलात्कार करने वाले दरिंदे मौजूद हैं। आज की नारी सबसे ज्यादा असुरक्षित अगर कहीं है तो वह उसका अपना घर या फिर वह स्थान है जहां पर वह काम करती है। काम करने वाली नौकरानियों का हाल तो सबसे बुरा है कहा जाए तो गलत नहीं होगा। सच्चाई यही है कि हर दूसरी नौकरानी भी बलात्कार या फिर यौन शोषण का शिकार होती है।

अचानक यह खबर आई कि फिल्म स्टार शाइनी आहूजा ने अपने घर पर काम करने वाली 18 साल की नौकरानी के साथ बलात्कार किया है। जैसे ही यह खबर फैली सब सकते में आए गए। इसी के साथ आया अखबारों, चैनलों के साथ ब्लाग जगत में भूचाल। हर कोई अपना-अपना राग अलापने लगा। शाइनी ने तो अपना अपराध भी कबूल कर लिया, ऐसी खबर भी आई। अपराध कबूल करने के बाद उनको पुलिस हिरासत में भेज दिया गया। शाइनी के बयान पर गौर करें तो उन्होंने अपना अपराध कबूल नहीं किया है, बल्कि यह माना है कि उन्होंने अपनी नौकरानी के साथ शारीरिक संबंध बनाए हैं। और ये संबंध उसकी मर्जी से बनाए हैं। यह अलग मुद्दा है कि उनकी नौकरानी ने उन पर बलात्कार का आरोप क्यों लगाया है। यह सब मालूम करना पुलिस का काम है। मुद्दा यह है कि शाइनी ने चाहे बलात्कार किया हो या फिर अपनी नौकरानी के साथ उसकी मर्जी से शारीरिक संबंध बनाए हों, है तो कुल मिलाकर यह गलत ही।

शाइनी जैसे अभिनेता अगर ऐसे करते हैं तो आम आदमी क्या करता होगा यह सोचने वाली बात है। अगर सच्चाई पर नजरें डाली जाएं तो आज हर घर में काम करने वाली दूसरी नौकरानी या तो बलात्कार की शिकार होती है या फिर उसका किसी भी तरह से यौन शोषण किया जाता है। अब यह शोषण चाहे उनको डरा कर किया जाता हो या फिर पैसों के दम पर। ज्यादातर मामले इसलिए सामने नहीं आ पाते हैं क्योंकि बलात्कार और यौन शोषण करने वाले दरिंदे ऐसी नौकरानियों की गरीबी की मजबूरी का फायदा उठाकर उनके हाथ में कागज के वो हरे-हरे नोट रख देते हैं जिनकी जरूरत सबको रहती है खासकर गरीबी में जीवन यापन करने वालों को। ऐसे में उन शिकार हुई महिलाओं को अपना मंहु बंद करना पड़ता है। जब महिलाओं का मुंह बंद हो जाता है तो ऐसे में हवस के पुजारियों के हौसले और बढ़ जाते हैं और उनके शिकार करने की भूख भी बढ़ जाती है। ऐसे में लगातार शिकार बढ़ते जाते हैं।


यह तो घर में काम करने वाली गरीब नौकरानियों की बातें हैं। लेकिन इससे आगे की बात की जाए तो आज ऐसा कौन सा दफ्तर है और कौन सा क्षेत्र है जहां पर महिलाओं के साथ अनाचार नहीं होता है। सबसे ज्यादा असुरक्षित कहीं महिलाएं हैं तो वो उनका अपना खुद का घर है। आज तो बाप भी सांप बन गए हैं और अपनी बेटियों को ही हवस का शिकार बनाने से पीछे नहीं हटते हैं। घर परिवार में ऐसा कोई नाते रिश्तेदार नहीं है जो महिलाओं को अपनी हवस का शिकार नहीं बनता है। आज लगता है कि समाज का पूरी तरह से पतन हो चुका है और इस समाज को सुधारने काफी कठिन है। यह एक गंभीर मुद्दा है जिस पर लगातार चिंतन के साथ ठोस कदम भी उठाने की जरूरत है। इसके लिए यह बहुत जरूरी है कि बलात्कार या यौन शोषण का शिकार होने वाली महिलाओं को ठीक उसी तरह से सामने आना पड़ेगा जिस तरह से शाइनी की नौकरानी सामने आईं हैं। उसकी हिम्मत की दाद देनी चाहिए कि उन्होंने एक स्टार के खिलाफ खड़े होने की हिम्मत की है।

अगर उसकी मंशा सही है तो सबको उसका साथ देना चाहिए। मंशा सही होने की बात हम इसलिए कह रहे हैं क्योंकि कई बार कई शातिर लड़कियां अपने मतलब के लिए ऐसा करने का काम करती हैं। कई उदाहरण हैं जब किसी का किसी से सौदा नहीं पटा है तो उस पर बलात्कार का आरोप लगाकर उसको कटघरे में खड़ा कर दिया गया है। जिस तरह से शाइनी के पक्ष में उनकी पत्नी के साथ और लोग खड़े हुए हैं उससे एक बार संदेह होता है फिर शाइनी के बयान को भी नहीं भूलना चाहिए जिसमें उन्होंने यह कहा है कि उन्होंने नौकरानी की मर्जी से उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए थे। किसी भी मामले में हर पहलू पर गौर करने के बाद ही किसी फैसले पर पहुंचना चाहिए। और अदालत भी यही करेगी। यह नहीं कि किसी पर आरोप लगा नहीं कि उसको चढ़ा दिया जाए सूली पर। अगर वास्तव में कोई अपराधी है तो उसको सजा दिलाने के लिए पूरे समाज को एकजुट हो जाना चाहिए। शाइनी भी अगर वास्तव में अपराधी हैं तो उनके खिलाफ देश भर की महिलाओं को ही नहीं बल्कि पुरुषों को भी उनके खिलाफ खड़े होना चाहिए। समाज के विरोध के बिना बलात्कार और यौन शोषण जैसा घिनौना अपराध करने वालों का कुछ बिगडऩे वाला नहीं है। जिसके साथ अनाचार होता है उसको कोर्ट में वकीलों के सामने क्या-क्या सहना पड़ता है यह बताने की बात नहीं है। इसी डर से भी ज्यादातर मामले सामने नहीं आ पाते हैं। इस मामले में काफी कुछ लिखा जा सकता है और कई ऐसे मामले हैं जिनकी चर्चा बाद में हम जरूर करेंगे। फिलहाल इतना ही। शेष बातें एक छोटे से ब्रेक के बाद।

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अरे ऐसे संपादक को घर भेजो न यार...

भारत के सबसे बड़े अंग्रेजी अखबार माने जाने वाले टाइम्स ऑफ इंडिया में अखबार का पूरा एक पन्ना और वो भी संपादकीय का पन्ना रिपीट हो जाता है। है न अखबार जगत के लिए शर्म की बात। वैसे ऐसे कारनामे कई अखबारों में होते रहते हैं। लेकिन अंग्रेजी अखबार जो कि अपने को महान समझते हैं और हिन्दी अखबारों में होने वाली गलतियों पर हंसते हैं अब उनके अखबार पर तो सारी दुनिया हंस रही है। एक ऐसी गलती जो कि क्षमा योग्य नहीं है। उस संपादकीय पन्ने को देखने वाले संपादक के लिए यह सबसे ज्यादा शर्म की बात है कि उनसे ऐसी गलती हुई है। एक तो अखबार को उस संपादक को ही घर का रास्ता दिखा देना चाहिए जो कि संभवत: अखबार ने किया होगा। वैसे उन संपादक महोदय को खुद ही नैतिकता के नाते अखबार छोड़ देना चाहिए। अगर उनमें नैतिकता है तो, वरना वे भी अपने देश के नेताओं की तरह अपनी कुर्सी से चिपके रह सकते हैं। लेकिन इसके लिए अखबार के मालिक की कृपा जरूरी होगी।


अखबारों में अक्सर समाचारों का रिपीट होना आम बात है। संभवत: ऐसा कोई अखबार नहीं होगा जिसमें जाने अंजाने ऐसी गलतियां न होती हों। अक्सर हिन्दी अखबारों के बारे में ऐसा कहा जाता है कि यह तो गलतियों का पिटारा है। माना की हिन्दी अखबार गलतियों का पिटारा है तो फिर आज टाइम्स ऑफ इंडिया में जो कुछ हुआ है वह तो गलतियों के पिटारे से भी बड़ा गलतियों का एक ऐसा पहाड़ है जिसको कोई क्षमा नहीं कर सकता है। अखबार की इस गलती की तरफ ब्लाग बिरादरी के एक जागरूक ब्लागर जयहिन्दी के बालसुब्रमण्यम ने ध्यान दिलाने का काम किया है। अखबार ने 15 जून को संपादकीय का जो पेज छापा था, वहीं पेज 16 जून को भी छाप दिया। अब इस महाभूल में गलती किसकी है इस पर अखबार में जरूर आज सुबह से ही चिंतन हुआ होगा और संभवत: इस गलती को करने वाले संपादक को ही किनारे भी लगा दिया गया होगा। ऐसा नहीं किया गया होगा तो यह अखबार की सबसे बड़ी भूल होगी। हमारे विचार से तो ऐसी गलती करने वाले को खुद ही नौकरी से नमस्ते कर लेना चाहिए। अगर आपमें क्षमता नहीं है तो क्यों किस संस्थान पर बोझ बनने का काम कर रहे हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की इस गलती ने अब हिन्दी अखबारों को भी बोलने का एक मौका दे दिया है। वरना कहां हिन्दी अखबारों को आज तक अंग्रेजी अखबार वाले कुछ समझते ही नहीं थे।


इसमें कोई दो मत नहीं है कि हिन्दी अखबारों में रोज ऐसी गलतियों होती रहती हैं। लेकिन पूरा का पूरा पेज रिपीट होने की गलती बहुत कम अखबारों में हुई है। हमें याद है कि हम जब दो साल पहले दैनिक देशबन्धु में समाचार संपादक थे तो हमने अखबार में अपने रहते समाचार रिपीट होना तो दूर कभी हेडिंग में भी गलती जाने नहीं दी। हमारी नजरों से ही अखबार से सारे के सारे करीब 30 पेज होकर जाते थे, मजाल है कि किसी में गलती हो जाए। आज हमें याद है कि हमारे उस अखबार को छोडऩे के बाद पिछले साल ही इसी जून के महीने में एक पेज रिपीट हो गया था। एक ही दिन में अखबार में एक ही पेज दो अलग-अलग पन्नों पर छप गया था। अगर काम को गंभीरता से नहीं किया जाएगा तो ऐसा ही होगा। अगर हमसे ऐसी भूल होती तो हम न सिर्फ अखबार के मालिक से माफी मांगते हुए नौकरी छोड़ देते बल्कि फिर भूले से भी पत्रकारिता का नाम नहीं लेते। लेकिन ऐसी नौबत हमारे साथ इसलिए कभी नहीं आई क्योंकि हममें आत्मविश्वास है और दुनिया में आत्मविश्वास से बड़ी पूजी नहीं है।

हमें आज भी याद है जब हम एक और अखबार में काम करते थे, तो हम वहां पर एक दिन अपने खेल का पेज लगाकर रात को 12 बजे आ गए थे। हमारे इसी पेज में प्रथम पेज की शेष खबरें जाती थीं। पहले संस्करण में सब कुछ ठीक-ठाक था, लेकिन दूसरे संस्करण में जब पहले पेज की शेष खबरें लगवाई गईं तो पहले पेज के संपादक ने ध्यान नहीं दिया और आपरेटर ने उसी तारीख के एक माह पुराने पेज में पहले पेज के शेष की खबरें लगा दीं और वह पेज छप गया। दूसरे दिन अखबार देखकर सबसे पहले संपादक को फोन हमने किया। पहले पेज के संपादक ने सारा दोष हम पर डालने का पूरा प्रयास किया, हमने संपादक के सामने पहला संस्करण रख दिया और कहा कि अगर पहले संस्करण में यह गलती होती तो दोषी हम होते। जब दूसरे और अंतिम संस्करण में हमारे पेज पर काम करवाने वाले पहले पेज के संपादक महोदय हैं तो फिर हम कहां दोषी हैं? अगर हमसे ऐसी भूल हुई होती तो हम खुद नौकरी छोड़ कर चले गए होते। उन पहले पेज के संपादक महोदय को काफी माफी के बाद रखा गया और पेज को लगाने वाले आपरेटर को निकालने की बात की गई तो हमने कहा कि जब सबसे बड़ी गलती करने वाले संपादक को नहीं निकाला जा रहा है तो बेचारे कम पढ़े-लिखे आपरेटर का क्या दोष? पेज चेक करने का काम संपादक का होता है न कि आपरेटर का।

तो जनाब ऐसी गलतियां हो जाती हैं लेकिन ऐसी गलती करने वाले को खुद अपनी जिम्मेदारी लेते हुए अपनी नौकरी को नमस्ते कर देना चाहिए। अगर टाइमस ऑफ इंडिया में उस गलती को करने वाले इंसान में पत्रकारिता की थोड़ी भी समझ होगी तो वे ऐसा ही करेंगे। बाकी अखबार गलती के लिए खेद प्रगट करने के अलावा और क्या कर सकता है। जब तीर कमान से निकल जाए तो फिर उससे कौन मरता है या घायल होता है क्या फर्क पड़ता है। अखबार तो छप गया है अब इसका क्या किया जा सकता है। अखबार की जितनी किरकिरी होनी थी हो गई है। अब उसको अपने वजूद को बचाने का काम करना है।

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मंगलवार, जून 16, 2009

बुरी नजर वाले तेरा मुंह गोरा

अरे.. अरे.. चौक गए न आप भी कि हम ये क्या कह रहे हैं। आज अचानक एक वाहन के पीछे फिर से यह लिखा दिख गया कि बुरी नजर वाले तेरा मुंह काला। आज भी राह चलते अक्सर ट्रकों, बसों और किसी भी चार चक्के वाले वाहन में यह एक मुहावरा लिखा दिख जाता है। हमने इस मुहावरे को देखने के बाद सोचा यार हमेशा यही लिखा मिलता है कि बुरी नजर वाले तेरा मुंह काला। लेकिन जहां तक हमें याद है कि अभी मुंबई में अपनी नौकरानी के साथ बलात्कार करने वाले यानी बुरी नजर रखने वाले शाइनी आहूजा का तो मुंह गोरा है। और भी न जाने ऐसे कितने दरिंदे हैं जो बलात्कार करने या फिर यौन शोषण करने का काम करते हैं। ऐसा करने वाले ज्यादातर लोगों के मुंह तो गोरे ही होते हैं। फिर यह क्यों कहा जाता है कि बुरी नजर वाले तेरा मुंह काला। हमें तो लगता है कि खामखा में बेचारे काले मुंह वालों को बुरा कहा जाता है। ऐसा नहीं है कि सभी काले मुंह वाले अच्छे हो सकते हैं, लेकिन बुरी नजरों के जितने मामले सामने आते हैं उनमें तो 80 प्रतिशत से ज्यादा गोरे मुंह वाले होते हैं। हमें तो लगता है कि अब इस मुहावरे को बदल कर बुरी नजर वाले तेरा मुंह गोरा रख देना चाहिए। भले मुहावरे का मतलब यह होता है कि बुरी नजर रखने वाले को लानत यानी उसका मुंह काला। लेकिन कितने लोगों का आज तक मुंह काला हुआ है।

बलात्कार और यौन शोषण करने वालों पर आपको कल राजतंत्र
में एक पोस्ट पढऩे को मिलेगी.. हर दूसरे घर में हैं बलात्कारी दरिंदे

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क्रिकेट देखना अब मजबूरी नहीं


एक वह समय था जब हमारे लिए क्रिकेट के सभी मैचों को देखना मजबूरी था। पर अब हम इस मजबूरी से काफी समय से आजाद हो गए हैं और अब हमने क्रिकेट देखना छोड़ दिया है। ऐसा नहीं है कि क्रिकेट में हमारी रूचि नहीं है। क्रिकेट में रूचि हमारी पहले भी उतनी ही थी जितनी रहनी चाहिए और आज भी उतनी ही है। फर्क यह है कि पहले हमें क्रिकेट के मैच इसलिए देखने पड़ते थे, क्योंकि हमें उनको देखकर समाचार बनाने के साथ टिप्पणी भी लिखनी पड़ती थी। लेकिन अब हमें चूंकि क्रिकेट के अंतरराष्ट्रीय स्तर के समाचार बनाने से मुक्ति मिल गई है, ऐसे में हमारे लिए अब मैचों को देखना मजबूरी नहीं रह गया है। हमने कभी क्रिकेट को दीवानों की तरह चाहने का काम नहीं किया है। हमारी नजर में एक क्रिकेट ही नहीं सारे खेल एक जैसे हैं फिर चाहे वह अपना देशी खेल कबड्डी हो, खो-खो हो या फिर कुश्ती या कोई भी दूसरा खेल।

आज चारों तरफ टी-20 विश्व कप क्रिकेट की धूम है। हर कोई अपने को क्रिकेटमय किए हुए हैं। क्रिकेट को जानने वाले भी और न जानने वाले भी यह जता रहे हैं कि हम तो क्रिकेट के बहुत जानकार हैं। टीवी के सामने मैच देखते हुए सभी अपने आप को विशेषज्ञ समझने लगते हैं। भारत की हार हुई नहीं कि सब अपने-अपने मत रखने लगते हैं। अरे यार सहवाग ने बड़ा ही गलत शाट खेला। युवराज को रन के लिए दौडऩे की क्या जरूरत थी। यार धोनी को ऐसे समय में स्पिनर को मोर्चे पर लगाना था, वगैरा-वगैरा। हमारी समझ में यह बात नहीं आती है कि क्रिकेट में ऐसा क्या रखा है जो हर कोई पेले पड़ा है इसी खेल के पीछे। इस खेल में यह बात एक बार नहीं कई बार साबित हो गई है कि क्रिकेट के मैचों में फिक्सिंग का खेल ज्यादा होता है। लेकिन इसके बाद भी सभी इसके पीछे ऐसे भागते हैं मानो उनके पीछे कोई भूत लगा हो। अरे भाई इतनी भी क्या दीवानगी है। वास्तव में यह आश्चर्यजनक है कि जिस खेल को चंद देश खेलते हैं उसके पीछे दुनिया दीवानी है। आज जबकि टी-20 का विश्व कप चल रहा है और भारत को बाहर का रास्ता देखना पड़ा है, ऐसे में जरूर भारत के दीवानों में मायूसी छा गई है। ईमानदारी की बात यह है कि हमें पहले से ही संदेह था कि भारत के लिए खिताब बचाना मुश्किल होगा। आईपीएल में खेलने के बाद भारतीय खिलाडिय़ों में इतनी ऊर्जा ही नहीं बची थी कि वे अपना खिताब बचा पाते और हुआ भी वहीं। हमने तो अब तक टी-20 का एक भी मैच नहीं देखा है। हमें मैच देखने की चाह भी नहीं थी। ठीक हमारे सामने प्रेस में टीवी पर लोग मैच देखते रहते हैं और हम अपने काम में लगे रहते हैं। हमें मैचों से कोई मतलब ही नहीं रहता है।

बहरहाल अभी मुद्दा यह नहीं है कि दुनिया क्रिकेट की क्यों दीवानी है। हम तो बात करे रहे थे अपनी की कि अब हमारे लिए क्रिकेट देखना मजबूरी नहीं रह गया है। वैसे हमें नहीं लगता है कि किसी के लिए क्रिकेट का मैच देखना मजबूरी रहता है, लेकिन हमारे साथ यह काफी लंबे समय तक यानी करीब 15 साल तक ऐसा हुआ है और हमने 15 साल क्रिकेट मैचों को महज मजबूरी के तहत ही झेला है। हमारे साथ क्रिकेट मैच देखने की मजबूरी इसलिए थी कि हम जिस दैनिक समाचार पत्र देशबन्धु में काम करते थे, वहां पर हम मैच देखकर ही जहां समाचार बनाते थे, वहीं मैचों पर टिप्पणी लिखने का भी काम करते थे। लगातार यह काम करने के बाद हमें कभी यह अहसास नहीं हुआ कि इस काम में बोरियत है। कारण यह नहीं कि क्रिकेट मैच देखने के कारण ऐसा होता था, बल्कि कारण यह कि हमने जब भी कोई काम किया है तो मन से किया है। मन से ही काम करने में काम अच्छा होता है ऐसा हमारा मानना है। वरना हमारी ज्यादा रूचि कभी 7 से 8 घंटे बैठकर मैच देखने में कदापि नहीं रही। किक्रेट मैचों में हमारी थोड़ी रूचि उसी समय तक थी जब तक मैच फिक्सिंग के मामले सामने नहीं आए थे। लेकिन इनके सामने आने के बाद कम से कम हमारी तो थोड़ी बहुत जो रूचि थी, उसका भी अंत हो गया और मैचों को हम महज एक समाचार मानकर ही देखते थे। वैसे मैच फिक्सिंग के मामलों के सामने आने से पहले ही हमारा ऐसा मानना था कि मैच फिक्स होते हैं। शारजाह में जब से क्रिकेट प्रारंभ हुआ था तभी से हमें कई मैचों के नतीजे खटकते थे। हमने काफी पहले अपने लेखों में ऐसा संदेह जताया भी था, पर इसको तब कोई मानने को तैयार नहीं होता था। लेकिन अब सब मानने लगे हैं कि मैच फिक्स होते हैं।


बहरहाल अब मैच फिक्स हो या न हो हमारे साथ अब मैच देखने की मजबूरी इसलिए नहीं रह गई है क्योंकि हम अब अखबार में खेल का वह अंतरराष्ट्रीय पन्ना नहीं देखते हैं जिसमें मैच की खबरें छपती हैं। आज हम खेलों की रिपोर्टिंग से जरूर जुड़े हुए हैं लेकिन छत्तीसगढ़ बनने के बाद अपने राज्य में होने वाली खेल गतिविधियों की रिपोर्टिंग ज्यादा करते हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर के मैचों पर लिखने का काम अब भी करते हैं, लेकिन यह काम अब उतने बड़े पैमाने पर नहीं करते जितना पहले करते थे। वैसे हमारी नजर में क्रिकेट के आगे भी कई खेल हैं जिनके बारे में लिखना चाहिए और यही काम हम अपने अखबार में करते हैं। इसके अलावा हम अपने एक ब्लाग खेलगढ़ में भी सभी खेलों को समान रूप से देखते हैं। संभवत: यही कारण रहा है कि हमारे खेलगढ़ के बारे में एनडीटीवी के रवीश कुमार ने दैनिक हिन्दुस्तान के अपने ब्लाग चर्चा कालम में खेलगढ़ को स्थान देने का काम किया। अगर खेलगढ़ भी क्रिकेट का ही राग अलापने का काम करता तो शायद इसकी तरफ रवीश कुमार जैसे लेखक का ध्यान कभी नहीं जाता। हमने एक संकल्प ले रखा है कि अपने राज्य के हर खेल को अंतरराष्ट्रीय मंच दिलाने का काम करना है इसके लिए ही हमने ब्लाग का सहारा लिया है। इसमें हमें कुछ हद तक तो सफलता मिलती दिख रही है।

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सोमवार, जून 15, 2009

रणजी खेलकर ही एक पीढ़ी तर सकती है

क्रिकेट में आज कितना पैसा आ गया है इसका सबूत इस बात से भी मिलता है कि कहा जा रहा है कि अगर कोई खिलाड़ी महज रणजी में खेल लेता है तो उसकी एक पीढ़ी तर सकती है। इस बात का खुलासा पूर्व अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी राजेश चौहान ने किया है। इसमें कोई दो मत नहीं है कि किसी खेल में अगर आज सबसे ज्यादा पैसा है तो वह क्रिकेट है। ऐसे में हर कोई आज क्रिकेटर ही बनना चाहता है। लेकिन यहां पर दुर्भाग्य यह है कि हर कोई बिना मेहनत किए ही मंजिल तक पहुंचने का सपना देखता है। आज के खिलाडिय़ों में मेहनत करने का जज्बा ही नहीं है।

राजधानी रायपुर में रियाज अकादमी के एक कार्यक्रम में आए राजेश ने नवोदित खिलाडिय़ों को यह बात बताते हुए कहा कि कहा कि पहले की तुलना में आज खिलाडिय़ों के लिए मौके बहुत हैं। अगर खिलाड़ी गंभीरता से खेल पर ध्यान दें और अगर उनको रणजी में ही खेलने का मौका मिल जाए तो रणजी में ही आज इतना पैसा हो गया है कि रणजी खेलकर ही आपकी एक पीढ़ी तर सकती है। राजेश चौहान का कहना है कि छत्तीसगढ़ में क्रिकेटरों के लिए सुविधाओं की कोई कमी नहीं है इसके बाद भी करीब दो दशक से यहां से कोई ऐसा खिलाड़ी नहीं निकला है जिसको भारतीय टीम में स्थान मिल सकता। खिलाडिय़ों के न निकलने का एक सबसे बड़ा कारण यही नजर आता है कि आज खिलाड़ी उतनी मेहनत नहीं करना चाहते हैं जितनी मेहनत की जरूरत भारतीय टीम के दरवाजे तक जाने के लिए लगती है।

श्री चौहान ने कहा कि यहां पर सबसे वरिष्ठ खेल पत्रकार राजकुमार ग्वालानी भी बैठे हैं। मैं उनसे ही पूछता हूं कि क्या मैं गलत कह रहा हूं। क्या आज उनको यह महसूस नहीं होता है कि छत्तीसगढ़ के क्रिकेट में एक शून्य आ गया है। उन्होंने कहा कि मुझे याद है जब हम खेलते थे और कुछ भी गलत कह देते थे तो ग्वालानी जी उसको छापने से पीछे नहीं हटते थे। लेकिन आज जो क्रिकेट में शून्य आ गया है उसके बारे में वे ही कितना लिखते रहेंगे। इस शून्य को भरने के लिए आज जरूरत है मेहनत करने की।


उन्होंने मंच की तरफ इशारा करते हुए कहा कि यहां पर 70 के दशक में छत्तीसगढ़ से राष्ट्रीय स्तर पर खेलने वाले महमूद हसन जैसे खिलाड़ी बैठे हैं। इसी के साथ गंगाराम शर्मा, केविन कास्टर अनिल नचरानी जैसे खिलाड़ी हैं जो खिलाडिय़ों को प्रेरणा देते हैं। मैं 80 के दशक में भारतीय टीम में आया। इसके बाद से ही छत्तीसगढ़ में क्रिकेट शून्य में चला गया है। यहां का कोई भी एक खिलाड़ी ऐसा नजर नहीं आता है जिससे यह उम्मीद की जा सके कि वह भारतीय टीम के दरवाजे तक जा सकता है। उन्होंने याद करते हुए कहा कि जब हम लोग खेलते थे, उस समय में उतनी सुविधाएं भी नहीं थी, लेकिन हम लोग आगे बढ़े तो इसके पीछे सबसे बड़ा कारण था कि हम लोग लगातार मैदान पर मेहनत करते थे। हम लोगों में एक जुनून था कि हमें भारतीय टीम तक पहुंचना है। लेकिन आज ऐसा जुनून किसी खिलाड़ी में नजर ही नहीं आता है। उन्होंने कहा कि अगर सुविधाएं मिलने से ही सफलता मिल जाती तो हर पैसे वाले घर का लड़का या लड़की वह सब हासिल कर लेते जो वे करना चाहते हैं। लेकिन ऐसा नहीं है सुविधाओं से ज्यादा महत्व आपकी सोच और मेहनत का है। श्री चौहान ने यह भी कहा कि आज सीनियर खिलाड़ी मैदान में भी नहीं आते हैं। जूनियर खिलाडिय़ों को प्रेरणा देने वालों की भी कमी है।

उन्होंने रियाज अकादमी को सलाह दी कि वे बाहर के खिलाडिय़ों के लिए एक छात्रावास की व्यवस्था करके अकादमी का बड़े पैमाने पर विस्तार करने का काम करें। उन्होंने इसी के साथ कहा कि अकादमी को दो-तीन स्कूलों के साथ अनुबंध करके अकादमी के खिलाडिय़ों को वहां शिक्षा दिलाने काम करना चाहिए। उन्होंने कहा कि आज खेल से ज्यादा महत्व पालक पढ़ाई को देते हैं ऐसे में पढ़ाई को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। श्री चौहान ने रियाज अकादमी द्वारा एक वेबसाइड बनाने की योजना की तारीफ करते हुए कहा कि इस वेबसाइट को ऐसा बनाना चाहिए जिसमें प्रदेश की सारी अकादमियां आ जाएँ। उन्होंने सभी अकादमियों को जोड़कर एक बेवसाइड बनाने की सलाह दी। इसी के साथ यह भी कहा कि अकादमियों के बीच अंतर अकादमी चैंपियनशिप बनाने की योजना अच्छी है, इसकी शुरुआत जल्द करनी चाहिए। जितने ज्यादा मैच खेलने के लिए खिलाडिय़ों को मिलेंगे उतना ही खिलाडिय़ों का फायदा होगा। उन्होंने महमूद हसन द्वारा रियाज अकादमी को अपनी टीम बनाने की सलाह का उल्लेख करते हुए कहा कि टीम बनाकर उनको मैच खेलने बाहर भेजना चाहिए। उन्होंने बताया कि वैसे मेरी अकादमी में रियाज अकादमी की टीम पिछले साल मैच खेलने आई थी।

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रविवार, जून 14, 2009

पापी पेट के लिए....

खल्लारी में माता के दरबार में जाने वाली सीढिय़ों के पास बैठा यह सूरदास भरी गर्मी में भी लगातार भजन ही नहीं हर तरह के गाने गाकर वहां आने वालों का मनोरंजन कर रहा था। इस सूरदास को भी बस चाह थी चंद सिक्कों की ताकि वो अपना पापी पेट भर सके। ऐसे में वह ऐसे गानों से भी परहेज नहीं कर रहा था जो गाने आमतौर पर सूरदास गाते नहीं हैं। कुछ युवक इस सूरदास से छत्तीसगढ़ गानों की फरमाइश करके उससे गाने सुन रहे थे।

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हत्या को दो प्यार का नाम-बच जाएगा होने से काम तमाम

अपने देश की सबसे बड़ी न्यायिक अदालत सुप्रीम कोर्ट ऐसे-ऐसे फैसले सुना देती है जिन पर यकीन नहीं होता है कि यह फैसला सुप्रीम कोर्ट का हो सकता है। एक मामले में आए फैसले पर गौर करने से समझ में नहीं आता है कि आखिर सुप्रीम कोर्ट इस फैसले से क्या साबित करना चाहता है। इस फैसले से तो लगता है अपराध कम होने की बजाए बढऩे लगेंगे। एक फैसले में सुप्रीम ने फैसला किया है कि प्यार के जुनून में की गई हत्या के लिए फांसी की सजा नहीं दी जा सकती है। इस फैसले के बाद अगर लोग हत्या को प्यार का नाम देने लगे या फिर अपनी प्रेमी या प्रेमिका की बेदर्दी से हत्या करने के मामले बढ़ जाएं तो आश्चर्य नहीं होगा। वैसे भी अपने देश में प्यार के जुनून में हत्याएं कुछ ज्यादा ही होती हैं । ऐसे में ऐसे हत्यारों को जिनको वास्तव में फांसी की सजा मिलनी चाहिए उनको इस सजा से बचाने का काम सुप्रीम कोर्ट ने किया है।

भारतीय संविधान में हत्या को सबसे बड़ा अपराध माना जाता है। इसके लिए फांसी की सजा का भी प्रावधान है। पर कई बार अपने देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट के फैसले चौंकाने वाले होते हैं। अब पंजाब सरकार की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए इस फैसले पर नजर डालें तो मालूम होता है कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न्यायसंगत नहीं है। दो आरोपियों ने अपनी सामूहिक रखैल के साथ मिलकर उसके पति और बेटे के साथ चार लोगों की बड़ी बेदर्दी से हत्या कर दी। ऐसे में इन आरोपियों को पंजाब सरकार फांसी की सजा दिलवाना चाहती है। पंजाब सरकार की एक याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि आरोपियों ने अपनी रखैल के बहकावे में आकर ऐसा अपराध किया है इसलिए उनको फांसी की सजा देना उपयुक्त नहीं है। अब सोचने वाली बात यह है कि क्या किसी के बहकावे में आकर अपराध करने से अपराध कम हो जाता है। हत्या तो हत्या है ऐसे में कैसे यह माना जाए कि वे आरोपी फांसी की सजा के हकदार नहीं है। माना कि अपने देश की सर्वोच्च अदालत के फैसले से कोई इंकार नहीं कर सकता है, लेकिन यह एक बहस का मुद्दा तो जरूर है कि कैसे किसी को इस बात की छूट दी सकती है कि वह अपराध करें और महज इसलिए उसके अपराध को कम करके आंका जाए कि उसने यह अपराध किसी के बहकावे में आकर किया था।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद तो लगता है कि अपराध करने वालों के लिए एक नया ही रास्ता खुल जाएगा। हत्या जैसा अपराध करने वाले यह साबित करने की कोशिश करने लगेंगे कि उन्होंने यह अपराध किसी के बहकावे में आकर किया है। इस फैसले के बाद तो उन प्यार में अंधे जुनूनी लोगों की लाटरी ही लग जाएगी जो एकतरफा प्यार करते हैं और इस प्यार के जुनून में अक्सर हत्या जैसा अपराध कर बैठते हैं। इसी के साथ शक की आग में जलने वाले भी अब हत्या करने से पीछे नहीं हटेंगे। वैसे भी शक के कारण होने वाली हत्याओं का ग्राफ भी कम नहीं है। अब कोई शक में हत्या कर बैठे और कहा जाए कि उसने तो प्यार के जुनून में हत्या की है तो यह बात तो गलत ही होगी। प्यार करने वाले हत्या नहीं करते हैं। हत्या करने वाले कभी किसी को प्यार कर ही नहीं सकते हैं। हत्या तो हमेशा नफरत की परिणीति का परिणाम होता है। पहले कम से कम इस बात का डर तो रहता था कि हत्या करने के बाद संभवत: उनकी भी जान जा सकती है और उनको फांसी हो सकती है, पर फांसी की सजा से बचाने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद तो लगता है प्यार में दीवाने लोगों को हत्या करने से डर नहीं लगेगा। ऐसा हुआ तो अपराध का ग्राफ कम होने की बजाए बढ़ जाएगा। अगर ऐसा हुआ तो जरूर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर एक प्रश्नचिन्ह लग जाएगा।

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